राजबब्बर ने जीती प्रतिष्ठा की लड़ाई
नई दिल्ली। लोकसभा की फिरोजाबाद सीट पर हुई प्रतिष्ठा की लड़ाई में कांग्रेस उम्मीदवार राज बब्बर जीत दर्ज करने में कामयाब रहे हैं। उन्होंने अपनी निकटतम प्रतिद्वंद्वी और सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव की बहू डिम्पल यादव को 85000 से अधिक वोटों से हराया।
यह सीट डिंपल के पति एवं सांसद अखिलेश यादव ने पिछले आम चुनाव में जीती थी परन्तु कन्नौज सीट भी जीतने के कारण उन्होंने यह सीट छोड़ दी थी।
उधर, राज्य विधानसभा उपचुनाव में सत्तारूढ़ बहुजन समाज पार्टी बढ़त बनाए हुए है, जबकि भाजपा और सपा को करारा झटका लगा है।
ताजा जानकारी के अनुसार, हैसर बाजार [सु] सीट पर बसपा के दशरथ सिंह चौहान ने कांग्रेस के नीलमणि को आठ हजार से अधिक के अंतर से हराया। सुल्तानपुर जिले की इसौली सीट बसपा उम्मीदवार वीरभद्र सिंह उर्फ सोनू सिहं ने जीत ली है। उन्होंने कांग्रेस के जयनारायण तिवारी को 49 हजार से अधिक मतों से परास्त किया। यह सीट वीरभद्र सिंह के इस्तीफे के बाद रिक्त हुई थी जो पिछले चुनाव में यहां से सपा के टिकट पर जीते थे और बाद मे विधानसभा से इस्तीफा देकर बसपा में शामिल हो गए थे।
बसपा उम्मीदवार महेन्द्र सिंह राजपूत ने समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव को करारा झटका देते हुए उनके गृह जनपद इटावा जिले की भरथना विधानसभा सीट पर कब्जा कर लिया है। राजपूत ने सपा उम्मीदवार विमल भदौरिया को 32000 मतों से परास्त किया है।
बसपा के उम्मीदवारों सुमन देवी कुशवाहा और राजदेव सिंह ने क्रमश: ललितपुर और रारी [जौनपुर] विधानसभा सीटें जीत ली हैं। ललितपुर सीट पर बसपा उम्मीदवार सुमन देवी कुशवाहा ने अपने निकटतम प्रतिद्वंदी सपा के चन्द्र भूषण सिंह को 14 हजार से अधिक वोटों से हरा दिया है। यह सीट सुमन देवी के पति नाथू राम कुशवाहा के निधन से खाली हुई थी।
जौनपुर की रारी विधानसभा सीट पर बसपा के राजदेव सिंह ने सपा के ओमप्रकाश दुबे को 12586 मतो से पराजित किया। यह सीट पिछले चुनाव में जनता दल [यू] के टिकट पर जीते धनंजय सिंह के इस्तीफे से खाली हुई थी। वाराणसी की प्रतिष्ठित कोलसला सीट निर्दलीय प्रत्याशी अजय राय ने 8169 मतों से जीतकर अपना कब्जा लगातार चौथी बार बरकरार रखा है। उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंदी बहुजन समाज पार्टी के जे पी मिश्रा को हराया।
मंगलवार, 10 नवंबर 2009
गुरुवार, 5 नवंबर 2009
अपने सांसद प्रत्याशी से पूछिए
जय भारत
अपने सांसद प्रत्याशी से पूछिए
थ् शैक्षणिक योग्यता
थ् पूर्व अनुभव
थ् पारिवारिक पृष्ठभूमि
थ् वर्तमान कार्य व्यवसाय
थ् किससे प्रेरित हुए
थ् क्यों नेता बनना चाहते हैं?
थ् समाज सेवा के अन्य अवसर क्यों अच्छे नहीं लगते?
थ् अपने वेतन मानदेय का क्या करेंगे?
थ् आय, जाति, ध्र्म और राष्ट्र में किसे प्राथमिकता देते हैं?
थ् बालश्रम, महिलाओं, शोषितों, पीड़ितों के लिए आपकी कार्यसूची क्या है?
थ् आपने देश के लिए व्यत्तिफगत तौर पर पिछले 10 वर्ष में क्या किया।
थ् पूरे क्षेत्रा में व्याप्त यातायात की समस्या से निपटने के लिए क्या योजना बनाई ?
थ् विद्यालयों में हुई पफीस बढ़ोतरी से निपटने के लिए उन्होंने अपनी पार्टी/दल द्वारा सरकार पर क्या दबाव बनाया?
थ् आपकी दश्ष्टि में वर्तमान में राष्ट्रीय समस्याएं कौनतकौन सी है। उनका निवारण कैसे होगा।
थ् यदि आप पहले भी सांसद रह चुके है तो कौन त कौन सी राष्ट्रीय समस्याओं के हल के लिए कितनी बार संसद में आवाज उठाई? या दलगत राजनीति में ही उलझे रहे।
थ् पिछले दस वर्ष में किसी राष्ट्रीय मुद्दे पर उन्होंने कोई वत्तफव्य दिया हो तो बताएं।
थ् जो मुद्दे उठा रहे हैं उनसे संबंध्ति आंकड़े और सबूत उनके पास हैं? यदि हां तो जनता के सामने प्रस्तुत करें।
थ् सेवा के अन्य क्षेत्रा छोड़कर सांसद का चुनाव ही क्यों अपनाया हैं? संसद में पहुंचकर वे क्या करना चाहते हैं?
थ् सक्रिय राजनीति से बाहर रहते हुए कितनी बार क्षेत्रा की समस्याओं के लिए आवाज उठाई? इस क्षेत्रा में बहुत सी समस्याएं हैं, इनके निपटारे के लिए क्या कोई कदम उठाने की कभी कोशिश की ?
थ् पिछले 10 वर्षों में इस पूरे क्षेत्रा के विकास जैसे सड़क, सामुदायिक भवन, स्कूल आदि के लिए आपका क्या योगदान रहा?
थ् आपकी पार्टी को स्विस बैंक में जमा ध्न की याद इस लोकसभा चुनाव में ही क्यों आई, इससे पहले इस मुद्दे पर क्यों नहीं कुछ कहा गया?
थ् यदि आप भाजपा प्रतयाशी है तो जब भाजपा सत्ता में थी तो राम मंदिर बनवाने और धरा-370 को हटवाने, समान नागरिक अध्किार के लिए क्या किया?
थ् इसकी क्या निश्चितता है कि चुनाव जीतने के बाद आप पिफर से अपने वचनों से नहीं भागेंगे?
थ् राष्ट्रहित में क्या योजनाए है आपके दल की, आपकी निजी?
थ् आज से पूर्व आप द्वारा किये गये राष्ट्रहित कार्य?
थ् अंग्रेजों की पफूट डालो राज करो नीति से बचने के उपाय? या उसी की पुष्टि करेंगे बाकी स्वार्थी नेताओं की तरह।
थ् मैं आपको अपना मत क्यों दूं?
थ् क्या आप हमें अंग्रेजी राज से मुक्ति दिला पायेंगे?
थ् क्या आप हमें जाति-ध्र्म-क्षेत्रातभाषा के विवादों से मुक्ति दिलायेंगे।
क्या आप हमें अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत को स्थापित कराएंगे। यही सच्ची स्वाध्ीनता होगी, क्योंकि अभी तक अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर इंडिया है, भारत को कोई नही जानता।
थ् राष्ट्र भाषा का अपमान राष्ट्र ध्वज के समान ही होता है इसलिये भारत के सभी सरकारी कार्य, न्यायालय, सर्वोच्च न्यायालय, संसदीय कार्यवाही आप हिन्दी में करा पायेंगे?
थ् भाषा के बिना राष्ट्र गूंगा ही नहीं वरन् लंगड़ा, लूला व बहरा भी हो जाता है। इसलिये 125 करोड़ लोगों की भाषा वाला राष्ट्र सर्वोत्तम है और हमसे विश्व है, यही मेरा स्वाभिमान है, हम ही अंतर्राष्ट्रीय है। हम किसी से कम नहीं।
थ् भारत के स्वाभिमान को जगाने के क्या उपाय है आपके पास
थ् क्या आप सबको समान शिक्षा, अपनी राष्ट्र भाषा में उच्च शिक्षा लागू करा पायेंगे? क्योकि भारत में अभी तक उच्चशिक्षा ;अभियंता, चिकितसक, एमबीए, एमसीए, विज्ञान एवं तकनीकी, अन्तरिक्ष, समुद्र, भू विज्ञान आदिद्ध का एक भी महाविद्यालय नही है। इन विद्याओं को पढने के लिए हमें पहले अंग्रेज बनना पडता है। क्या आप मेरे देश के गौरव को बचाने में मेरी सहायता करेगे? सबको रोजगार, समान अध्किार योग्यतानुसार दिला पाएंगे।
थ् आप अपने बच्चो को मेरे गाँव के सरकारी विद्यालय में पढ़ाएंगे/ पढ़ाए है या किसी महानगर के वातानुकुलित 5 सितारा पब्लिक स्कूल में विदेशी गुलामी की भाषा में पढ़ाकर हम पर रोब जमाने के लिए तैयार किए है/करेंगे।
थ् क्या आप सभी औषध्यिों पर उनका विवरण मेरी राष्ट्रभाषा में लिखा पाएंगे।
थ् क्या आप भारत से भ्रटाचार व जातिवाद मिटा पायेंगे। सभी तरह के पफार्म प्रारूप से जाति वाला काला ध्ब्बा मिटा पायेंगे? जिसकी आज अतयन्त आवश्यकता है।
थ् इस देश में ध्र्म परिवर्तन का अध्किार सबको है, जाति परिवर्तन का क्यों नहीं? क्या आप जाति बदलने का अध्किार अर्थात जातिवाद मिटाने में महतवपूर्ण निभा पायेंगे या कर्मानुसार नई जातियों को मान्यता दिला पायेंगे? जो जन्म के नही वरन् कर्म के आध्र पर हो और व्यक्ति के बाद बच्चो को ना परोसी जाये।
थ् अगर आप पूर्व में सांसद रहे है तोतआपने सरकार को कितने सुझाव दिए या दलगत राजनीति में ही उलझे रहे, कितनों पर सुनवाई हुई, नहीं तो क्यों?
थ् आपने संसद में कितने जनहित/राष्ट्रहित के प्रश्न पूछे?
थ् अंग्रेजों ने भारत के स्वाभिमान को मिटाने के लिए भारतीय संस्कृति पर प्रहार करके अंग्रेजी भाषा और अंग्रेजी दिशाहीन, अवैज्ञानिक, अव्यवहारिक भ्रामक, चरित्राहीन, असमान, दोहरे मापदंडों वाली भ्रष्टाचारी, व्याभिचारी, मानवीय मूल्यों से दूर मौद्रिक मूल्यों पर आधरित, पूंजीवादी, सामाज्यवादी, सामन्तवादी शिक्षा व संस्कृति का प्रचार प्रसार किया और स्वतंत्राता के बाद भी वो ही सब जारी रहा। क्या आप भारत में पुनः अपनी सम्पूर्ण वैज्ञानिक संस्कारवान, सत्यनिष्ठवान, कत्र्तव्यनिष्ठ, चरित्रावान, स्पष्ट, समरस, समानता उतपन्न करने वाली शिक्षा प(ति, भारत को विश्वगुरू बनाने वाली संस्कृति स्थापित करा पायेंगे?
अपने सांसद प्रत्याशी से पूछिए
थ् शैक्षणिक योग्यता
थ् पूर्व अनुभव
थ् पारिवारिक पृष्ठभूमि
थ् वर्तमान कार्य व्यवसाय
थ् किससे प्रेरित हुए
थ् क्यों नेता बनना चाहते हैं?
थ् समाज सेवा के अन्य अवसर क्यों अच्छे नहीं लगते?
थ् अपने वेतन मानदेय का क्या करेंगे?
थ् आय, जाति, ध्र्म और राष्ट्र में किसे प्राथमिकता देते हैं?
थ् बालश्रम, महिलाओं, शोषितों, पीड़ितों के लिए आपकी कार्यसूची क्या है?
थ् आपने देश के लिए व्यत्तिफगत तौर पर पिछले 10 वर्ष में क्या किया।
थ् पूरे क्षेत्रा में व्याप्त यातायात की समस्या से निपटने के लिए क्या योजना बनाई ?
थ् विद्यालयों में हुई पफीस बढ़ोतरी से निपटने के लिए उन्होंने अपनी पार्टी/दल द्वारा सरकार पर क्या दबाव बनाया?
थ् आपकी दश्ष्टि में वर्तमान में राष्ट्रीय समस्याएं कौनतकौन सी है। उनका निवारण कैसे होगा।
थ् यदि आप पहले भी सांसद रह चुके है तो कौन त कौन सी राष्ट्रीय समस्याओं के हल के लिए कितनी बार संसद में आवाज उठाई? या दलगत राजनीति में ही उलझे रहे।
थ् पिछले दस वर्ष में किसी राष्ट्रीय मुद्दे पर उन्होंने कोई वत्तफव्य दिया हो तो बताएं।
थ् जो मुद्दे उठा रहे हैं उनसे संबंध्ति आंकड़े और सबूत उनके पास हैं? यदि हां तो जनता के सामने प्रस्तुत करें।
थ् सेवा के अन्य क्षेत्रा छोड़कर सांसद का चुनाव ही क्यों अपनाया हैं? संसद में पहुंचकर वे क्या करना चाहते हैं?
थ् सक्रिय राजनीति से बाहर रहते हुए कितनी बार क्षेत्रा की समस्याओं के लिए आवाज उठाई? इस क्षेत्रा में बहुत सी समस्याएं हैं, इनके निपटारे के लिए क्या कोई कदम उठाने की कभी कोशिश की ?
थ् पिछले 10 वर्षों में इस पूरे क्षेत्रा के विकास जैसे सड़क, सामुदायिक भवन, स्कूल आदि के लिए आपका क्या योगदान रहा?
थ् आपकी पार्टी को स्विस बैंक में जमा ध्न की याद इस लोकसभा चुनाव में ही क्यों आई, इससे पहले इस मुद्दे पर क्यों नहीं कुछ कहा गया?
थ् यदि आप भाजपा प्रतयाशी है तो जब भाजपा सत्ता में थी तो राम मंदिर बनवाने और धरा-370 को हटवाने, समान नागरिक अध्किार के लिए क्या किया?
थ् इसकी क्या निश्चितता है कि चुनाव जीतने के बाद आप पिफर से अपने वचनों से नहीं भागेंगे?
थ् राष्ट्रहित में क्या योजनाए है आपके दल की, आपकी निजी?
थ् आज से पूर्व आप द्वारा किये गये राष्ट्रहित कार्य?
थ् अंग्रेजों की पफूट डालो राज करो नीति से बचने के उपाय? या उसी की पुष्टि करेंगे बाकी स्वार्थी नेताओं की तरह।
थ् मैं आपको अपना मत क्यों दूं?
थ् क्या आप हमें अंग्रेजी राज से मुक्ति दिला पायेंगे?
थ् क्या आप हमें जाति-ध्र्म-क्षेत्रातभाषा के विवादों से मुक्ति दिलायेंगे।
क्या आप हमें अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत को स्थापित कराएंगे। यही सच्ची स्वाध्ीनता होगी, क्योंकि अभी तक अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर इंडिया है, भारत को कोई नही जानता।
थ् राष्ट्र भाषा का अपमान राष्ट्र ध्वज के समान ही होता है इसलिये भारत के सभी सरकारी कार्य, न्यायालय, सर्वोच्च न्यायालय, संसदीय कार्यवाही आप हिन्दी में करा पायेंगे?
थ् भाषा के बिना राष्ट्र गूंगा ही नहीं वरन् लंगड़ा, लूला व बहरा भी हो जाता है। इसलिये 125 करोड़ लोगों की भाषा वाला राष्ट्र सर्वोत्तम है और हमसे विश्व है, यही मेरा स्वाभिमान है, हम ही अंतर्राष्ट्रीय है। हम किसी से कम नहीं।
थ् भारत के स्वाभिमान को जगाने के क्या उपाय है आपके पास
थ् क्या आप सबको समान शिक्षा, अपनी राष्ट्र भाषा में उच्च शिक्षा लागू करा पायेंगे? क्योकि भारत में अभी तक उच्चशिक्षा ;अभियंता, चिकितसक, एमबीए, एमसीए, विज्ञान एवं तकनीकी, अन्तरिक्ष, समुद्र, भू विज्ञान आदिद्ध का एक भी महाविद्यालय नही है। इन विद्याओं को पढने के लिए हमें पहले अंग्रेज बनना पडता है। क्या आप मेरे देश के गौरव को बचाने में मेरी सहायता करेगे? सबको रोजगार, समान अध्किार योग्यतानुसार दिला पाएंगे।
थ् आप अपने बच्चो को मेरे गाँव के सरकारी विद्यालय में पढ़ाएंगे/ पढ़ाए है या किसी महानगर के वातानुकुलित 5 सितारा पब्लिक स्कूल में विदेशी गुलामी की भाषा में पढ़ाकर हम पर रोब जमाने के लिए तैयार किए है/करेंगे।
थ् क्या आप सभी औषध्यिों पर उनका विवरण मेरी राष्ट्रभाषा में लिखा पाएंगे।
थ् क्या आप भारत से भ्रटाचार व जातिवाद मिटा पायेंगे। सभी तरह के पफार्म प्रारूप से जाति वाला काला ध्ब्बा मिटा पायेंगे? जिसकी आज अतयन्त आवश्यकता है।
थ् इस देश में ध्र्म परिवर्तन का अध्किार सबको है, जाति परिवर्तन का क्यों नहीं? क्या आप जाति बदलने का अध्किार अर्थात जातिवाद मिटाने में महतवपूर्ण निभा पायेंगे या कर्मानुसार नई जातियों को मान्यता दिला पायेंगे? जो जन्म के नही वरन् कर्म के आध्र पर हो और व्यक्ति के बाद बच्चो को ना परोसी जाये।
थ् अगर आप पूर्व में सांसद रहे है तोतआपने सरकार को कितने सुझाव दिए या दलगत राजनीति में ही उलझे रहे, कितनों पर सुनवाई हुई, नहीं तो क्यों?
थ् आपने संसद में कितने जनहित/राष्ट्रहित के प्रश्न पूछे?
थ् अंग्रेजों ने भारत के स्वाभिमान को मिटाने के लिए भारतीय संस्कृति पर प्रहार करके अंग्रेजी भाषा और अंग्रेजी दिशाहीन, अवैज्ञानिक, अव्यवहारिक भ्रामक, चरित्राहीन, असमान, दोहरे मापदंडों वाली भ्रष्टाचारी, व्याभिचारी, मानवीय मूल्यों से दूर मौद्रिक मूल्यों पर आधरित, पूंजीवादी, सामाज्यवादी, सामन्तवादी शिक्षा व संस्कृति का प्रचार प्रसार किया और स्वतंत्राता के बाद भी वो ही सब जारी रहा। क्या आप भारत में पुनः अपनी सम्पूर्ण वैज्ञानिक संस्कारवान, सत्यनिष्ठवान, कत्र्तव्यनिष्ठ, चरित्रावान, स्पष्ट, समरस, समानता उतपन्न करने वाली शिक्षा प(ति, भारत को विश्वगुरू बनाने वाली संस्कृति स्थापित करा पायेंगे?
शनिवार, 3 अक्टूबर 2009
गांधी जी के साथ याद किए गए शास्त्री जी
फिरोजाबाद तरंग नगर की विभिन्न शैक्षिक संस्थाओं में धूमधाम से मनाई गई जयंती रंगारंग ध्वजारोहण और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी प्रस्तुत किए छात्र-छात्राओं को महापुरुषों के बारे में जानकारी दी
फिरोजाबाद नगर की शैक्षिक संस्थाओं में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री की जयंती पर विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित कर सादगी पूर्वक मनाई। इस अवसर पर कालेजों में ध्वजारोहण के पश्चात छात्र-छात्राओं ने सांस्कृतिक और रंगारंग कार्यक्रम प्रस्तुत किए। 'रघुपति राघव राजा राम, पतित पावन सीता राम के स्वर गूंजते रहे। इस्लामिया इंटर कालेज में कालेज प्रबंधक गुलाम नवी ने राष्ट्रीय ध्वज फहराया। बापू एवं शास्त्री के चित्रों पर माल्यार्पण कर उनके आदर्शों पर चलने का संदेश दिया। इस अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किया गया। प्रधानाचार्य डा. इमत्याज हुसैन ने बापू के आदर्शों पर चलने की प्रेरणा दी। प्राथमिक विद्यालय कपावली और कन्या पूर्व माध्यमिक विद्यालय कपावली (नारखी) में सामूहिक रूप से एक महोत्सव विद्यालय प्रांगण में आयोजित किया गया। इसमें प्रधान अध्यापक जूनियर हाईस्कूल श4बीर अली और मिथलेश कुमारी ने महात्मा गांधी और शास्त्री के विषय बच्चों को अवगत कराया। श्री पीडी जैन इंटर कालेज में भी उ1त दोनों महापुरुषों की जयंती मनाई गई। कार्यक्रम की अध्यक्षता कालेज के प्राचार्य आदित्य कुमार गुप्ता ने की। इस अवसर पर कमल कुमार जैन, विमल कुमार शर्मा, साहस कुमार जैन सहित अन्य अध्यापकों ने विचार व्य1त किए। श्री आदिनाथ जैन विद्यालय छोटी छपैटी में गांधी और शास्त्री जयंती मनाई गई। कार्यक्रम का प्रारंभ विद्यालय की प्रधानाचार्या आशा कुलश्रेष्ठ ने किया। डा. राम मनोहर लोहिया जूनियर हाईस्कूल में महापुरुषों की जयंती समारोह पूर्वक मनाई गई। ध्वजारोहण विद्यालय के प्रधानाध्यापक अमरपाल सिंह लोधी ने किया। इस अवसर पर छात्र-छात्राओं ने सांस्कृतिक और रंगारंग कार्यक्रम प्रस्तुत किए। वहीं एजी स्कूल सुहाग नगर में भी महापुरुषों की जयंती हर्षोल्लास पूर्वक मनाई गई। महेंद्रा आशुलिप शिक्षा संस्थान की ओर से संचालित विशेष बाल श्रमिक विद्यालय अंबे नगर और कश्मीरी गेट द्वितीय में गांधी के जन्मोत्सव पर ध्वजारोहण किया गया।
श्री तिलक विद्यालय इंटर कालेज, रफी अहमद किदवई जूनियर हाईस्कूल मैमरान में विद्यालय इंचार्ज अमन द्विवेदी ने गांधी और शास्त्री जयंती पर बच्चों को उनके आदर्शों पर चलने का संकल्प दिलाया। स्वामी रामतीर्थ गल्र्स कालेज में प्रधानाचार्य अशोक यादव और वरिष्ठ अध्यापक शैलेंद्र कुमार चतुर्वेदी ने गांधी और शास्त्री के चित्र पर माल्यार्पण किया। श्री चिरौंजी लाल छदामीलाल शिक्षा समिति की ओर से संचालित विशेष बाल श्रमिक विद्यालय रसूलपुर प्रथम और द्वितीय में प्रधानाचार्य एके सिंह के नेतृत्व में और रामा कन्या विद्यालय इंटर कालेज में प्रधानाचार्य कल्पना शर्मा के नेतृत्व में जयंती धूमधाम से मनाई।
फोटो नं. १०गांधी जयंती के अवसर पर विद्यालय में बच्चों को पाठ्य सामग्री वितरित करते लोग।
नगर में राजनीतिक और सामाजिक संस्थाओं ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की जयंती हर्षोल्लास से मनाई। सभी लोगों ने महापुरुषों के तैल चित्रों पर माल्यार्पण और पुष्प अर्पित कर उनके आदर्शों पर चलने का संकल्प लिया। कांग्रेस कार्यालय पर इस अवसर पर राम धुन का गायन भी किया गया।
शहर कांग्रेस कमेटी की ओर से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री की जयंती चौराहा गंज स्थित कार्यालय में समारोह पूर्वक आयोजित की गई। इसमें व1ताओं ने निर्णय लिया कि बापू की जयंती पर दलित कार्यकर्ता के यहां सभी लोग सहभोज करेंगे। सभी लोक आसफाबाद स्थित विश्व प्रताप सिंह दिवाकर के यहां सहभोज करने गए। इस अवसर पर शहर इंका अध्यक्ष शफात खान, नसीर अहमद और प्रेमनारायण द्विवेदी ने विचार व्य1त करते हुए महापुरुषों को शत-शत नमन किया। इस अवसर पर कांग्रेस के जिलाध्यक्ष केशव देव, नुरुल हुदा लाला राईन, कुसुम सिंह, मीना यादव, नईम खां सहित सैकड़ों कांग्रेसी उपस्थित थे। राष्ट्रीय मजदूर कांग्रेस इंटक के जिलाध्यक्ष इरफान राही के नेतृत्व में एक गोष्ठी कार्यालय पर आयोजित की गई। इसमें महापुरुषों के चित्र पर माल्यार्पण कर उन्हें याद किया। इस अवसर पर सतीश जैन, हरवंश लाल कपूर, प्रेमचंद्र शंखवार, रामजीलाल जाटव और राधेश्याम आदि उपस्थित थे। जिला कांग्रेस कमेटी (इ) के जिला कोआर्डिनेटर राजेश तिवारी के नेतृत्व में पेमेश्वर गेट पर विचार गोष्ठी आयोजित की गई। इसमें नियामत, विमल बाबू, शाहिद रहमान और हरिओम झा आदि उपस्थित थे।
शहर कांग्रेस कमेटी मानवाधिकार प्रकोष्ठ फीरोजाबाद की ओर से गांधी और शास्त्री जयंती पर जिला अस्पताल में र1तदान किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता संदीप तिवारी ने की। इसमें शिवम् तिवारी, संजय श्रोत्रिय, संदीप तिवारी, और अमित उपाध्याय आदि लोग उपस्थित थे। शहर युवक कांग्रेस केमेटी (आई) के अध्यक्ष वैभव चतुर्वेदी ने कार्यकर्ताओं के साथ जिला अस्पताल में मरीजों को फल बांटे।
जायंट्स ग्रुप आफ फीरोजाबाद महिला द्वारा बापू और शास्त्री की जयंती पर सेवा दिवस का आयोजन किया। इसमें ग्रुप की सदस्याओं ने आर्य नगर स्थित नर्सिंग होम में मरीजों का हालचाल भी पूछा। इस अवसर पर सौ या चौहान, कविता खरबंदा, रेखा यादव, अनुपम जैन, नित्या उपाध्याय, कमलेश सचदेवा, नीता गुप्ता और आरती शर्मा सहित दर्जनों सदस्याएं उपस्थित थीं। मानव जन कल्याण और विकास समिति के प्रधान अध्यक्ष बालकृष्ण गुप्त की अध्यक्षता में कश्मीरी गेट पर जयंती मनाई गई। अखिल भारतीय राठौर साहू महासभा ने भी बापू और शास्त्री जयंती विचार गोष्ठी के रूप में मनाई। प्रदेश महामंत्री अहिबरन सिंह राठौर ने गांधी पार्क में गांधी की प्रतिमा पर महासभा के सभी कार्यकर्ताओं ने माल्यार्पण किया। अखिल भारतीय जन कल्याण सभा और मुस्लिम सेवा समिति की ओर से भी बापू और शास्त्री की जयंती मनाते हुए मिष्ठान वितरण किया। नेहरू युवा केंद्र संगठन द्वारा नेहरू युवा केंद्र कार्यालय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया।
फिरोजाबाद नगर की शैक्षिक संस्थाओं में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री की जयंती पर विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित कर सादगी पूर्वक मनाई। इस अवसर पर कालेजों में ध्वजारोहण के पश्चात छात्र-छात्राओं ने सांस्कृतिक और रंगारंग कार्यक्रम प्रस्तुत किए। 'रघुपति राघव राजा राम, पतित पावन सीता राम के स्वर गूंजते रहे। इस्लामिया इंटर कालेज में कालेज प्रबंधक गुलाम नवी ने राष्ट्रीय ध्वज फहराया। बापू एवं शास्त्री के चित्रों पर माल्यार्पण कर उनके आदर्शों पर चलने का संदेश दिया। इस अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किया गया। प्रधानाचार्य डा. इमत्याज हुसैन ने बापू के आदर्शों पर चलने की प्रेरणा दी। प्राथमिक विद्यालय कपावली और कन्या पूर्व माध्यमिक विद्यालय कपावली (नारखी) में सामूहिक रूप से एक महोत्सव विद्यालय प्रांगण में आयोजित किया गया। इसमें प्रधान अध्यापक जूनियर हाईस्कूल श4बीर अली और मिथलेश कुमारी ने महात्मा गांधी और शास्त्री के विषय बच्चों को अवगत कराया। श्री पीडी जैन इंटर कालेज में भी उ1त दोनों महापुरुषों की जयंती मनाई गई। कार्यक्रम की अध्यक्षता कालेज के प्राचार्य आदित्य कुमार गुप्ता ने की। इस अवसर पर कमल कुमार जैन, विमल कुमार शर्मा, साहस कुमार जैन सहित अन्य अध्यापकों ने विचार व्य1त किए। श्री आदिनाथ जैन विद्यालय छोटी छपैटी में गांधी और शास्त्री जयंती मनाई गई। कार्यक्रम का प्रारंभ विद्यालय की प्रधानाचार्या आशा कुलश्रेष्ठ ने किया। डा. राम मनोहर लोहिया जूनियर हाईस्कूल में महापुरुषों की जयंती समारोह पूर्वक मनाई गई। ध्वजारोहण विद्यालय के प्रधानाध्यापक अमरपाल सिंह लोधी ने किया। इस अवसर पर छात्र-छात्राओं ने सांस्कृतिक और रंगारंग कार्यक्रम प्रस्तुत किए। वहीं एजी स्कूल सुहाग नगर में भी महापुरुषों की जयंती हर्षोल्लास पूर्वक मनाई गई। महेंद्रा आशुलिप शिक्षा संस्थान की ओर से संचालित विशेष बाल श्रमिक विद्यालय अंबे नगर और कश्मीरी गेट द्वितीय में गांधी के जन्मोत्सव पर ध्वजारोहण किया गया।
श्री तिलक विद्यालय इंटर कालेज, रफी अहमद किदवई जूनियर हाईस्कूल मैमरान में विद्यालय इंचार्ज अमन द्विवेदी ने गांधी और शास्त्री जयंती पर बच्चों को उनके आदर्शों पर चलने का संकल्प दिलाया। स्वामी रामतीर्थ गल्र्स कालेज में प्रधानाचार्य अशोक यादव और वरिष्ठ अध्यापक शैलेंद्र कुमार चतुर्वेदी ने गांधी और शास्त्री के चित्र पर माल्यार्पण किया। श्री चिरौंजी लाल छदामीलाल शिक्षा समिति की ओर से संचालित विशेष बाल श्रमिक विद्यालय रसूलपुर प्रथम और द्वितीय में प्रधानाचार्य एके सिंह के नेतृत्व में और रामा कन्या विद्यालय इंटर कालेज में प्रधानाचार्य कल्पना शर्मा के नेतृत्व में जयंती धूमधाम से मनाई।
फोटो नं. १०गांधी जयंती के अवसर पर विद्यालय में बच्चों को पाठ्य सामग्री वितरित करते लोग।
नगर में राजनीतिक और सामाजिक संस्थाओं ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की जयंती हर्षोल्लास से मनाई। सभी लोगों ने महापुरुषों के तैल चित्रों पर माल्यार्पण और पुष्प अर्पित कर उनके आदर्शों पर चलने का संकल्प लिया। कांग्रेस कार्यालय पर इस अवसर पर राम धुन का गायन भी किया गया।
शहर कांग्रेस कमेटी की ओर से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री की जयंती चौराहा गंज स्थित कार्यालय में समारोह पूर्वक आयोजित की गई। इसमें व1ताओं ने निर्णय लिया कि बापू की जयंती पर दलित कार्यकर्ता के यहां सभी लोग सहभोज करेंगे। सभी लोक आसफाबाद स्थित विश्व प्रताप सिंह दिवाकर के यहां सहभोज करने गए। इस अवसर पर शहर इंका अध्यक्ष शफात खान, नसीर अहमद और प्रेमनारायण द्विवेदी ने विचार व्य1त करते हुए महापुरुषों को शत-शत नमन किया। इस अवसर पर कांग्रेस के जिलाध्यक्ष केशव देव, नुरुल हुदा लाला राईन, कुसुम सिंह, मीना यादव, नईम खां सहित सैकड़ों कांग्रेसी उपस्थित थे। राष्ट्रीय मजदूर कांग्रेस इंटक के जिलाध्यक्ष इरफान राही के नेतृत्व में एक गोष्ठी कार्यालय पर आयोजित की गई। इसमें महापुरुषों के चित्र पर माल्यार्पण कर उन्हें याद किया। इस अवसर पर सतीश जैन, हरवंश लाल कपूर, प्रेमचंद्र शंखवार, रामजीलाल जाटव और राधेश्याम आदि उपस्थित थे। जिला कांग्रेस कमेटी (इ) के जिला कोआर्डिनेटर राजेश तिवारी के नेतृत्व में पेमेश्वर गेट पर विचार गोष्ठी आयोजित की गई। इसमें नियामत, विमल बाबू, शाहिद रहमान और हरिओम झा आदि उपस्थित थे।
शहर कांग्रेस कमेटी मानवाधिकार प्रकोष्ठ फीरोजाबाद की ओर से गांधी और शास्त्री जयंती पर जिला अस्पताल में र1तदान किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता संदीप तिवारी ने की। इसमें शिवम् तिवारी, संजय श्रोत्रिय, संदीप तिवारी, और अमित उपाध्याय आदि लोग उपस्थित थे। शहर युवक कांग्रेस केमेटी (आई) के अध्यक्ष वैभव चतुर्वेदी ने कार्यकर्ताओं के साथ जिला अस्पताल में मरीजों को फल बांटे।
जायंट्स ग्रुप आफ फीरोजाबाद महिला द्वारा बापू और शास्त्री की जयंती पर सेवा दिवस का आयोजन किया। इसमें ग्रुप की सदस्याओं ने आर्य नगर स्थित नर्सिंग होम में मरीजों का हालचाल भी पूछा। इस अवसर पर सौ या चौहान, कविता खरबंदा, रेखा यादव, अनुपम जैन, नित्या उपाध्याय, कमलेश सचदेवा, नीता गुप्ता और आरती शर्मा सहित दर्जनों सदस्याएं उपस्थित थीं। मानव जन कल्याण और विकास समिति के प्रधान अध्यक्ष बालकृष्ण गुप्त की अध्यक्षता में कश्मीरी गेट पर जयंती मनाई गई। अखिल भारतीय राठौर साहू महासभा ने भी बापू और शास्त्री जयंती विचार गोष्ठी के रूप में मनाई। प्रदेश महामंत्री अहिबरन सिंह राठौर ने गांधी पार्क में गांधी की प्रतिमा पर महासभा के सभी कार्यकर्ताओं ने माल्यार्पण किया। अखिल भारतीय जन कल्याण सभा और मुस्लिम सेवा समिति की ओर से भी बापू और शास्त्री की जयंती मनाते हुए मिष्ठान वितरण किया। नेहरू युवा केंद्र संगठन द्वारा नेहरू युवा केंद्र कार्यालय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया।
शुक्रवार, 18 सितंबर 2009
मृत जानवर की चर्बी से घी बनानेवालों का पर्दाफाश
फिरोज़ाबाद। खाने- पीने की चीजों में मिलावट का धंधा रुकने का नाम ही नहीं ले रहा और आए दिन ऐसे ठिकानों का पता चल रहा है जहां इस तरह के चंद रुपयों का नफा कमाने के लिए ये घिनौने काम कर रहे हैं। नगर मजिस्ट्रेट की अगुवाई में एक जांच दल ने बगदादनगर और ताड़ों वाली बगिया में छापा मारा और दो ऐसे लोगों को गिरफ्तार किया जो नकली घी बनाने का धंधा कर रहे थे। पुलिस ने इन दो लोगों को तो गिरफ्तार कर लिया पर बाकी लोग भाग निकले। जांच दल ने ये छापा एक शिकायत के बाद मारा था जिसके मुताबिक ये लोग नकली घी बनाने में चर्बी का इस्तेमाल करते थे। छापे में जानवरों की बहुत सी खालें,बडी तादात में कनस्तर नकली घी और घी बनाने में इस्तेमाल होने वाला सामान बरामद हुआ है। कढ़ाहों में उबलती चर्बी को देख जांच दल दंग रह गये। मरे जानवरों के अंग और चमड़े के ढेर भी मौके से बरामद हुए। पुलिस ने इस मामले में दो लोगों को गिरफ्तार कर लिया है।
उत्तर प्रदेशः सबको शिक्षा के नारे से कोसों दूर
आशीष पांच साल का बच्चा है. वह लखनऊ के डालीबाग़ इलाक़े में वसंत विहार प्राइवेट स्कूल में एक साल पढ़ चुका है इसलिए वह एबीसीडी और गिनती पढ़-लिख लेता है. आशीष को स्कूल में पढ़ना, खेलना और खाना अच्छा लगता है लेकिन अब वह स्कूल नहीं जाता, क्योंकि उसके पिता के पास स्कूल की दाख़िला फ़ीस और मासिक फ़ीस देने का पैसा नहीं है.
आशीष के पिता मनोज कुमार वर्मा एक प्राइवेट कंपनी में ड्राइवर हैं और उनके दो बच्चे हैं.
मनोज कुमार कहते हैं, "साढ़े तीन हज़ार वेतन है. 1500 रुपए किराया दे देता हूँ, पांच सौ रुपया दूध का. मेरे पास कुछ बचता ही नहीं कि बच्चों को पढ़ा सकूँ.''
बीबीसी विशेष
भारत सरकार हाल ही में सभी को मुफ़्त एवं अनिवार्य शिक्षा विधेयक ले कर आई है लेकिन क्या ये आसानी से लागू होगा. ज़मीनी सच्चाई को खोजने की कोशिश कर रहे हैं विभिन्न बीबीसी संवाददाता. पढ़िए, दूसरी कड़ी उत्तर प्रदेश से ...
मनोज की कोशिश है कि अब वो अपने बेटे को किसी सरकारी स्कूल में दाख़िल कर दें लेकिन सरकारी स्कूल में शिक्षा की गुणवत्ता से वो संतुष्ट नहीं हैं.
दूसरी दिक़्क़त यह है कि सरकारी व्यवस्था में छह साल से कम उम्र यानी नर्सरी और 14 साल से अधिक यानी हाईस्कूल की व्यवस्था नहीं है, जबकि ज़्यादातर निजी स्कूलों में नर्सरी में दाख़िल होने के बाद बच्चा इंटर पास करके निकलता है.
अधिकारियों का कहना है कि पिछले सात बरसों में सर्व शिक्षा अभियान के तहत इतना काम हुआ है कि अब उत्तर प्रदेश में ग्रामीण क्षेत्रों में बेसिक स्कूलों की कमी नहीं रह गई है. एक किलोमीटर की परिधि में प्राइमरी और दो किलोमीटर की परिधि में अपर प्राइमरी स्कूल खुल गए हैं. इन स्कूलों की संख्या बढ़ कर एक 1,95,940 हो गई है.
लेकिन शहरी क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों और शिक्षकों की बहुत कमी है. शहरी क्षेत्रों में लगभग 30 फ़ीसदी आबादी मलिन बस्तियों में रहती है, जहां स्कूल नहीं खुले. ज़मीने मंहगी हैं. पुराने स्कूल किराए के जीर्ण-शीर्ण भवनों में चल रहे हैं और किराया नगण्य होने से मकान मालिक उन्हें खाली कराना चाहते हैं.
राजधानी लखनऊ के नगर क्षेत्र में ही 30 वार्ड ऐसे हैं जहां बिल्डिंग न होने के कारण स्कूल नहीं हैं. यह समस्या मुरादाबाद, आगरा, फिरोज़ाबाद और अन्य शहरों में भी है. वर्ष 1998 के बाद से शहरी क्षेत्रों में अध्यापक तैनात नहीं हुए.
नए स्कूल खुलने और मिड डे मील के आकर्षण से स्कूलों में प्राइमरी स्कूलों में दाख़िले बढ़े हैं, लेकिन अपर प्राइमरी स्कूलों में उतने बच्चे नहीं जा रहे. यानी बड़ी तादाद में बच्चे आठवीं तक नहीं पहुंचते जो नए क़ानून का लक्ष्य है.
गुणवत्ता का सवाल
एक और बड़ी समस्या सरकारी स्कूलों की शिक्षा में गुणवत्ता सुधारने और उनको निजी स्कूलों के साथ समान स्तर पर लाने की है जिससे अमीर और ग़रीब गाँव और देहात के बच्चों की पढ़ाई के स्तर का भेद ख़त्म हो.
सरकार कुछ भी कर ले, जब तक अभिभावक जागरूक नहीं होंगे तब तक हालत नहीं बदलेंगे. जब तक अभिभावकों को बच्चों को स्कूल न भेजने के लिए सज़ा नहीं मिलेगी, वो जागरूक नहीं होंगे. आज 13 साल का बच्चा सौ रुपये मज़दूरी लाता है.
प्रिंसिपल सरला श्रीवास्तव
हकीक़त से रूबरू होने के लिए मैं बाराबंकी बहराइच मार्ग पर ग्रामीण क्षेत्रों में निजी और सरकारी स्कूल देखने गया. यह एक सुखद संयोग हो सकता है कि दोनों स्कूल खुले थे और टीचर क्लास में पढ़ा रहे थे.
प्राइमरी स्कूल सुरसंडा में एक से पांचवीं तक 276 बच्चे हैं जबकि केवल तीन नियमित और दो शिक्षामित्र टीचर हैं. यानी एक टीचर पर 55 बच्चे. स्कूल में कमरे कम हैं. क्लास एक और दो के बच्चे एक ही कमरे में बैठे थे. हालांकि तारीफ़ की बात है कि क्लासरूम को ऐसे चित्रों और पोस्टरों से सजाया गया था जो पढ़ने में सहायक हों.
एक अनुमान के मुताबिक उत्तर प्रदेश में छह से 14 साल की उम्र के क़रीब पौने छह करोड़ बच्चे हैं, इनमें से क़रीब पौने चार करोड़ सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं. बाक़ी या तो निजी स्कूलों में हैं या स्कूल से बाहर. सरकारी आकड़ों के अनुसार पिछले साल राज्य में तीन लाख छोटे बच्चे स्कूल से बाहर थे.
एक स्कूल की प्रिंसिपल, सरला श्रीवास्तव कहती हैं, ''सरकार कुछ भी कर ले, जब तक अभिभावक जागरूक नहीं होंगे तब तक हालत नहीं बदलेंगे. जब तक अभिभावकों को बच्चों को स्कूल न भेजने के लिए सज़ा नहीं मिलेगी, वो जागरूक नहीं होंगे. आज 13 साल का बच्चा सौ रुपये मज़दूरी लाता है. लड़कियों को वह समझते हैं कि पढ़ाई के बाद शादी कर देना है बस.''
छात्रवृत्ति के लालच में लड़कियों के दाख़िले बढ़े हैं. यह भी मालूम हुआ कि कई लोग अपने बच्चे का नाम सरकारी स्कूल में लिखा लेते हैं लेकिन उसे भेजते हैं किसी निजी स्कूल में. एक कारण यह है कि निजी स्कूल मान्यता प्राप्त नहीं है या फिर इसलिए भी ताकि सरकारी स्कूल वाली सुविधा भी मिलती रहे.
इसमें ग्राम प्रधान और अध्यापक दोनों का फ़ायदा है. इसे रोकने के लिए अब सरकार बच्चों की डिजिटल फोटोग्राफ़ी कराकर उन्हें एक पहचान नंबर देने जा रही है, यह पहचान हमेशा ऊंची क्लास तक छात्र के साथ रहेगी.
पास के शहाबपुर बाज़ार में कई निजी स्कूल हैं. पास पड़ोस के गाँव वाले रिक्शों पर अपने बच्चे यहाँ भेजते हैं और ऊंची फ़ीस भी देते हैं. ये वे अभिभावक हैं जो संपन्न हैं और पढ़ाई के प्रति जागरूक भी.
आज़ाद हायर सेकेंडरी स्कूल की टीचर रेशमा बानो कहती हैं कि निजी स्कूलों में शिक्षा का स्तर ज़्यादा अच्छा है इसलिए लोग वहां पैसा देकर भी पढ़ाते हैं, हालाँकि सरकार सरकारी स्कूलों में तमाम सुविधा भी दे रही है, वज़ीफ़ा भी ड्रेस और खाना भी. लेकिन वहाँ बच्चे ज़्यादा हैं और टीचर बहुत कम. वह भी खाना बनवाने और पोलियो में लगे रहते हैं. निजी स्कूलों की पढ़ाई का तरीका भी अलग है.
रोज़गारपरक शिक्षा
समस्या का एक और पहलू है कि पढ़-लिख लेने के बाद कोई शारीरिक श्रम वाला काम नहीं करना चाहता और बाबूगीरी की नौकरियां इतनी हैं नहीं. इसलिए कई माँ-बाप सोचते हैं कि पढ़ने के बजाय बच्चा खेत में ही काम करें.
शिक्षा को रोज़गारपरक बनाना भी एक अहम ज़रूरत है
बाराबंकी के बेसिक शिक्षा अधिकारी प्रवीण मणि त्रिपाठी कहते हैं कि सरकारी स्कूलों का माहौल बदलने के लिए शिक्षा को गुणवत्तापरक बनाकर उसमें व्यावसायिक शिक्षा को भी जोड़ना पड़ेगा.
उनका कहना है कि अगर सरकारी स्कूल उच्च तबके के बच्चों को अपने से जोड़ पाएं तो और लोग भी अपने बच्चे वहां पढ़ाने को प्रेरित होंगे.
सरकार ने निजी स्कूलों में 25 फ़ीसदी सीटें पड़ोस के ग़रीब बच्चों के लिए आरक्षित करने का क़ानून बनाया है लेकिन लखनऊ की सबसे बड़ी स्कूल श्रृंखला सिटी मॉन्टेसरी स्कूल के प्रबंधक जगदीश गांधी कहते हैं कि चूंकि सरकार प्रतिपूर्ति बहुत कम देगी इसलिए इन बच्चों का बोझ दूसरे बच्चों के अभिभावकों पर पड़ेगा.
जगदीश गांधी क़ानून के उस प्रावधान के भी ख़िलाफ़ हैं जिसमें क्लास एक से आठ तक कोई इम्तेहान न लेने और बिना रोक-टोक पास करते रहने की व्यवस्था है.
जगदीश गांधी के अनुसार सरकारी स्कूलों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वहां नीचे से ऊपर तक किसी की कोई जवाबदेही नहीं है.
मगर निजी स्कूलों पर नियंत्रण भी एक विकट समस्या होगी. इनकी संख्या उत्तर प्रदेश में लगभग 13 हज़ार है.
गुणवत्ता सुधारने के लिए सबसे ज़रूरी है पर्याप्त संख्या में शिक्षक. उत्तर प्रदेश में एक शिक्षक पर 51 बच्चों का औसत है जबकि राष्ट्रीय औसत 34 छात्रों पर एक शिक्षक का है.
संसाधनों का अभाव
उत्तर प्रदेश में अब भी 13,113 स्कूल ऐसे हैं जहां केवल एक शिक्षक उपलब्ध है. जिस दिन वह शिक्षक अवकाश पर हो या किसी अन्य सरकारी काम पर हो उस दिन समझें कि स्कूल बंद.
निजी संस्थान भले ही अंतरराष्ट्रीय मानकों के हो गए हों, पर बहुमत विद्यार्थी अभावों में पढ़ाई करने को मजबूर हैं.
यातायात के साधन और अन्य सुविधाएं न होने से सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में अध्यापक जाना नहीं चाहते, जबकि शहर और सड़क के करीब वाले स्कूलों में टीचर ज़्यादा हैं.
इसी तरह आर्थिक दृष्टि से संपन्न पश्चिमी ज़िलों में सरकारी स्कूलों में छात्र और शिक्षक ज़्यादा हैं, जबकि पूरब के ग़रीब ज़िलों में छात्र ज़्यादा और शिक्षक कम हैं.
आबादी के हिसाब से उत्तर प्रदेश में छस से 14 साल की उम्र के बच्चों की संख्या लगभग पौने छह करोड़ है. प्रदेश में इस समय तीन करोड़, 62 लाख 63 हज़ार बच्चे स्कूलों में पढ़ रहे हैं. निजी स्कूलों को मिलाकर भी बहुत से बच्चे स्कूलों से बाहर हैं.
आदर्श स्थिति में कम से कम 10 लाख शिक्षक होने चाहिए. वर्तमान में शिक्षकों के कुल स्वीकृत पद 4,06,607 हैं इनमें से लगभग एक तिहाई यानी 1,53,623 पद ख़ाली हैं. कमी को पूरा करने के लिए एक लाख 86 हज़ार शिक्षामित्र लगाए गए हैं.
नए क़ानून में केवल प्रशिक्षित शिक्षक को ही मान्यता दी गई है जबकि उत्तर प्रदेश में कई बरसों से बीटीसी की ट्रेनिंग ही बंद थी. अब ट्रेनिंग शुरू हुई है मगर एक साल में लगभग सात हज़ार बीटीसी शिक्षक ट्रेंड करने की क्षमता है. दूसरी ओर हर साल लगभग दस हज़ार टीचर रिटायर हो रहे हैं.
यानी एक अभियान चलाकर बड़ी संख्या में शिक्षकों की ट्रेनिंग और तैनाती की ज़रूरत है. ट्रेनिंग में यह बात भी शामिल हो कि टीचर बच्चों को पीटे और धमकाए बिना पढ़ने के लिए प्रेरित कर सकें.
इसके बाद यह भी ध्यान देने की ज़रूरत है कि स्कूलों का वातावरण ठीक हो यानी पर्याप्त रोशनी और हवादार कमरे हों, पेयजल, टॉयलेट, पुस्तकालय, टीचिंग सामग्री, खेल का मैदान और उपकरण हों. इन मामलों में उत्तर प्रदेश में अभी बहुत काम करने की ज़रूरत है.
क़ानून को लागू करने के लिए राज्यों को तीन साल का समय दिया गया है जिसमें स्कूलों के लिए सक्षम प्रबंधकीय ढांचा खड़ा किया जाना है. बताया जाता है कि विकसित राज्यों में एक विकेंद्रित प्रशासनिक मशीनरी है जो स्थानीय स्तर पर स्कूलों की मॉनीटरिंग करती है.
राज्य में औसतन आधे शिक्षक किसी न किसी कारण से स्कूलकार्य से ग़ायब रहते हैं. स्कूलों की संख्या दोगुनी हो गई है लेकिन सुपरवाइज़री स्टाफ़ नहीं है.
जवाबदेही की कमी
भ्रष्टाचार बढ़ गया है. बेसिक शिक्षा अधिकारी केवल मंत्री के प्रशासनिक नियंत्रण में हैं और वहां भी रिश्वत देकर तबादले-नियुक्तियां होती हैं. नतीजतन शायद उत्तर प्रदेश एक अकेला राज्य है जहां मिड-डे मील और बिल्डिंग निर्माण के अलावा टीचरों के तबादले में भी रिश्वत ली जाती है.
पिछड़े इलाकों में बच्चों को स्कूलों तक लाना एक चुनौती है
अन्य राज्यों की तरह यहाँ सरकार प्राइमरी शिक्षा ज़िला परिषद या शहरी स्थानीय निकायों को देने को तैयार नहीं. सरकार ऐसा कोई प्रशासनिक ढांचा नहीं बना रही जिससे टीचरों को पूरे समय पढ़ाने के लिए बाध्य किया जा सके.
नए क़ानून में यह व्यवस्था है कि टीचरों से चुनाव और जनगणना को छोड़ और काम न लिए जाएँ. इसका मतलब यह कि राज्य को अन्य कार्यों के लिए दूसरे स्टाफ़ रखने होंगे.
नए क़ानून में सरकार पर ज़िम्मेदारी डाली गई है कि निजी स्कूल अपने यहाँ 25 फ़ीसदी सीटें पड़ोस के निर्धन बच्चों के लिए रखें. दाख़िले में कोई अनुदान न लें और माँ-बाप या बच्चों का स्क्रीनिंग टेस्ट न लें. मगर इसको क्रियान्वित करने के लिए उत्तर प्रदेश में कोई मशीनरी नहीं है.
यूनिसेफ लखनऊ में शिक्षा विशेषज्ञ विनोबा गौतम कहते हैं, ''मुझे लगता है कि सरकार को कमर कसना पडेगा और कसना चाहिए ,लेकिन मै सहमत हूँ कि आज के दिन में सरकार अनभिज्ञ है कि आने वाले दिनों में उन्हें कौन सी चुनौतियों का सामना करना पडेगा. ''
लेकिन उत्तर प्रदेश में सर्व शिक्षा अभियान के निदेशक गांगुली कहते हैं, ''कॉमन यानि एक समान स्कूल की संकल्पना अब से चालीस वर्ष पहले कोठारी आयोग ने किया था. तब से किसी न किसी किसी कारणवश इसका क्रियान्वयन नही किया जा सका. कम से कम यह पहला कदम है कि हम कॉमन स्कूल की ओर अग्रसर हो रहे हैं.
आने वाले दिनों में अगर हम परिषदीय विद्यालयों में गुणवत्ता युक्त परिवेश, पर्याप्त सुविधाएं और छात्रों के अनुपात से शिक्षक सुनिश्चित कर सकें तो एक पड़ोस में रहने वाले सभी लोग अपने बच्चों को इन स्कूलों में भेजेंगे.''
एक हकीकत है कि सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर ठीक न होने से संपन्न लोग अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढाते हैं. अब केवल गरीब लोग ही अपने बच्चे सरकारी स्कूलों में भेजते हैं.
एक अध्ययन के मुताबिक इसका मतलब है कि इन स्कूलों में ज्यादातर बच्चे दलित और मुसिलम समुदायों के हैं. इस लिए सबसे ज्यादा लाभ इन्ही बच्चों को मिलेगा.
इस लिहाज से इस नए कानून को प्रगतिशील और क्रांतिकारी भी कहा जा रहा है. लेकिन कई लोग यह कहकर आलोचना भी करते हैं कि यह एक समान शिक्षा के बजाय दोहरी व्यवस्था को मान्या देता है
आशीष के पिता मनोज कुमार वर्मा एक प्राइवेट कंपनी में ड्राइवर हैं और उनके दो बच्चे हैं.
मनोज कुमार कहते हैं, "साढ़े तीन हज़ार वेतन है. 1500 रुपए किराया दे देता हूँ, पांच सौ रुपया दूध का. मेरे पास कुछ बचता ही नहीं कि बच्चों को पढ़ा सकूँ.''
बीबीसी विशेष
भारत सरकार हाल ही में सभी को मुफ़्त एवं अनिवार्य शिक्षा विधेयक ले कर आई है लेकिन क्या ये आसानी से लागू होगा. ज़मीनी सच्चाई को खोजने की कोशिश कर रहे हैं विभिन्न बीबीसी संवाददाता. पढ़िए, दूसरी कड़ी उत्तर प्रदेश से ...
मनोज की कोशिश है कि अब वो अपने बेटे को किसी सरकारी स्कूल में दाख़िल कर दें लेकिन सरकारी स्कूल में शिक्षा की गुणवत्ता से वो संतुष्ट नहीं हैं.
दूसरी दिक़्क़त यह है कि सरकारी व्यवस्था में छह साल से कम उम्र यानी नर्सरी और 14 साल से अधिक यानी हाईस्कूल की व्यवस्था नहीं है, जबकि ज़्यादातर निजी स्कूलों में नर्सरी में दाख़िल होने के बाद बच्चा इंटर पास करके निकलता है.
अधिकारियों का कहना है कि पिछले सात बरसों में सर्व शिक्षा अभियान के तहत इतना काम हुआ है कि अब उत्तर प्रदेश में ग्रामीण क्षेत्रों में बेसिक स्कूलों की कमी नहीं रह गई है. एक किलोमीटर की परिधि में प्राइमरी और दो किलोमीटर की परिधि में अपर प्राइमरी स्कूल खुल गए हैं. इन स्कूलों की संख्या बढ़ कर एक 1,95,940 हो गई है.
लेकिन शहरी क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों और शिक्षकों की बहुत कमी है. शहरी क्षेत्रों में लगभग 30 फ़ीसदी आबादी मलिन बस्तियों में रहती है, जहां स्कूल नहीं खुले. ज़मीने मंहगी हैं. पुराने स्कूल किराए के जीर्ण-शीर्ण भवनों में चल रहे हैं और किराया नगण्य होने से मकान मालिक उन्हें खाली कराना चाहते हैं.
राजधानी लखनऊ के नगर क्षेत्र में ही 30 वार्ड ऐसे हैं जहां बिल्डिंग न होने के कारण स्कूल नहीं हैं. यह समस्या मुरादाबाद, आगरा, फिरोज़ाबाद और अन्य शहरों में भी है. वर्ष 1998 के बाद से शहरी क्षेत्रों में अध्यापक तैनात नहीं हुए.
नए स्कूल खुलने और मिड डे मील के आकर्षण से स्कूलों में प्राइमरी स्कूलों में दाख़िले बढ़े हैं, लेकिन अपर प्राइमरी स्कूलों में उतने बच्चे नहीं जा रहे. यानी बड़ी तादाद में बच्चे आठवीं तक नहीं पहुंचते जो नए क़ानून का लक्ष्य है.
गुणवत्ता का सवाल
एक और बड़ी समस्या सरकारी स्कूलों की शिक्षा में गुणवत्ता सुधारने और उनको निजी स्कूलों के साथ समान स्तर पर लाने की है जिससे अमीर और ग़रीब गाँव और देहात के बच्चों की पढ़ाई के स्तर का भेद ख़त्म हो.
सरकार कुछ भी कर ले, जब तक अभिभावक जागरूक नहीं होंगे तब तक हालत नहीं बदलेंगे. जब तक अभिभावकों को बच्चों को स्कूल न भेजने के लिए सज़ा नहीं मिलेगी, वो जागरूक नहीं होंगे. आज 13 साल का बच्चा सौ रुपये मज़दूरी लाता है.
प्रिंसिपल सरला श्रीवास्तव
हकीक़त से रूबरू होने के लिए मैं बाराबंकी बहराइच मार्ग पर ग्रामीण क्षेत्रों में निजी और सरकारी स्कूल देखने गया. यह एक सुखद संयोग हो सकता है कि दोनों स्कूल खुले थे और टीचर क्लास में पढ़ा रहे थे.
प्राइमरी स्कूल सुरसंडा में एक से पांचवीं तक 276 बच्चे हैं जबकि केवल तीन नियमित और दो शिक्षामित्र टीचर हैं. यानी एक टीचर पर 55 बच्चे. स्कूल में कमरे कम हैं. क्लास एक और दो के बच्चे एक ही कमरे में बैठे थे. हालांकि तारीफ़ की बात है कि क्लासरूम को ऐसे चित्रों और पोस्टरों से सजाया गया था जो पढ़ने में सहायक हों.
एक अनुमान के मुताबिक उत्तर प्रदेश में छह से 14 साल की उम्र के क़रीब पौने छह करोड़ बच्चे हैं, इनमें से क़रीब पौने चार करोड़ सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं. बाक़ी या तो निजी स्कूलों में हैं या स्कूल से बाहर. सरकारी आकड़ों के अनुसार पिछले साल राज्य में तीन लाख छोटे बच्चे स्कूल से बाहर थे.
एक स्कूल की प्रिंसिपल, सरला श्रीवास्तव कहती हैं, ''सरकार कुछ भी कर ले, जब तक अभिभावक जागरूक नहीं होंगे तब तक हालत नहीं बदलेंगे. जब तक अभिभावकों को बच्चों को स्कूल न भेजने के लिए सज़ा नहीं मिलेगी, वो जागरूक नहीं होंगे. आज 13 साल का बच्चा सौ रुपये मज़दूरी लाता है. लड़कियों को वह समझते हैं कि पढ़ाई के बाद शादी कर देना है बस.''
छात्रवृत्ति के लालच में लड़कियों के दाख़िले बढ़े हैं. यह भी मालूम हुआ कि कई लोग अपने बच्चे का नाम सरकारी स्कूल में लिखा लेते हैं लेकिन उसे भेजते हैं किसी निजी स्कूल में. एक कारण यह है कि निजी स्कूल मान्यता प्राप्त नहीं है या फिर इसलिए भी ताकि सरकारी स्कूल वाली सुविधा भी मिलती रहे.
इसमें ग्राम प्रधान और अध्यापक दोनों का फ़ायदा है. इसे रोकने के लिए अब सरकार बच्चों की डिजिटल फोटोग्राफ़ी कराकर उन्हें एक पहचान नंबर देने जा रही है, यह पहचान हमेशा ऊंची क्लास तक छात्र के साथ रहेगी.
पास के शहाबपुर बाज़ार में कई निजी स्कूल हैं. पास पड़ोस के गाँव वाले रिक्शों पर अपने बच्चे यहाँ भेजते हैं और ऊंची फ़ीस भी देते हैं. ये वे अभिभावक हैं जो संपन्न हैं और पढ़ाई के प्रति जागरूक भी.
आज़ाद हायर सेकेंडरी स्कूल की टीचर रेशमा बानो कहती हैं कि निजी स्कूलों में शिक्षा का स्तर ज़्यादा अच्छा है इसलिए लोग वहां पैसा देकर भी पढ़ाते हैं, हालाँकि सरकार सरकारी स्कूलों में तमाम सुविधा भी दे रही है, वज़ीफ़ा भी ड्रेस और खाना भी. लेकिन वहाँ बच्चे ज़्यादा हैं और टीचर बहुत कम. वह भी खाना बनवाने और पोलियो में लगे रहते हैं. निजी स्कूलों की पढ़ाई का तरीका भी अलग है.
रोज़गारपरक शिक्षा
समस्या का एक और पहलू है कि पढ़-लिख लेने के बाद कोई शारीरिक श्रम वाला काम नहीं करना चाहता और बाबूगीरी की नौकरियां इतनी हैं नहीं. इसलिए कई माँ-बाप सोचते हैं कि पढ़ने के बजाय बच्चा खेत में ही काम करें.
शिक्षा को रोज़गारपरक बनाना भी एक अहम ज़रूरत है
बाराबंकी के बेसिक शिक्षा अधिकारी प्रवीण मणि त्रिपाठी कहते हैं कि सरकारी स्कूलों का माहौल बदलने के लिए शिक्षा को गुणवत्तापरक बनाकर उसमें व्यावसायिक शिक्षा को भी जोड़ना पड़ेगा.
उनका कहना है कि अगर सरकारी स्कूल उच्च तबके के बच्चों को अपने से जोड़ पाएं तो और लोग भी अपने बच्चे वहां पढ़ाने को प्रेरित होंगे.
सरकार ने निजी स्कूलों में 25 फ़ीसदी सीटें पड़ोस के ग़रीब बच्चों के लिए आरक्षित करने का क़ानून बनाया है लेकिन लखनऊ की सबसे बड़ी स्कूल श्रृंखला सिटी मॉन्टेसरी स्कूल के प्रबंधक जगदीश गांधी कहते हैं कि चूंकि सरकार प्रतिपूर्ति बहुत कम देगी इसलिए इन बच्चों का बोझ दूसरे बच्चों के अभिभावकों पर पड़ेगा.
जगदीश गांधी क़ानून के उस प्रावधान के भी ख़िलाफ़ हैं जिसमें क्लास एक से आठ तक कोई इम्तेहान न लेने और बिना रोक-टोक पास करते रहने की व्यवस्था है.
जगदीश गांधी के अनुसार सरकारी स्कूलों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वहां नीचे से ऊपर तक किसी की कोई जवाबदेही नहीं है.
मगर निजी स्कूलों पर नियंत्रण भी एक विकट समस्या होगी. इनकी संख्या उत्तर प्रदेश में लगभग 13 हज़ार है.
गुणवत्ता सुधारने के लिए सबसे ज़रूरी है पर्याप्त संख्या में शिक्षक. उत्तर प्रदेश में एक शिक्षक पर 51 बच्चों का औसत है जबकि राष्ट्रीय औसत 34 छात्रों पर एक शिक्षक का है.
संसाधनों का अभाव
उत्तर प्रदेश में अब भी 13,113 स्कूल ऐसे हैं जहां केवल एक शिक्षक उपलब्ध है. जिस दिन वह शिक्षक अवकाश पर हो या किसी अन्य सरकारी काम पर हो उस दिन समझें कि स्कूल बंद.
निजी संस्थान भले ही अंतरराष्ट्रीय मानकों के हो गए हों, पर बहुमत विद्यार्थी अभावों में पढ़ाई करने को मजबूर हैं.
यातायात के साधन और अन्य सुविधाएं न होने से सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में अध्यापक जाना नहीं चाहते, जबकि शहर और सड़क के करीब वाले स्कूलों में टीचर ज़्यादा हैं.
इसी तरह आर्थिक दृष्टि से संपन्न पश्चिमी ज़िलों में सरकारी स्कूलों में छात्र और शिक्षक ज़्यादा हैं, जबकि पूरब के ग़रीब ज़िलों में छात्र ज़्यादा और शिक्षक कम हैं.
आबादी के हिसाब से उत्तर प्रदेश में छस से 14 साल की उम्र के बच्चों की संख्या लगभग पौने छह करोड़ है. प्रदेश में इस समय तीन करोड़, 62 लाख 63 हज़ार बच्चे स्कूलों में पढ़ रहे हैं. निजी स्कूलों को मिलाकर भी बहुत से बच्चे स्कूलों से बाहर हैं.
आदर्श स्थिति में कम से कम 10 लाख शिक्षक होने चाहिए. वर्तमान में शिक्षकों के कुल स्वीकृत पद 4,06,607 हैं इनमें से लगभग एक तिहाई यानी 1,53,623 पद ख़ाली हैं. कमी को पूरा करने के लिए एक लाख 86 हज़ार शिक्षामित्र लगाए गए हैं.
नए क़ानून में केवल प्रशिक्षित शिक्षक को ही मान्यता दी गई है जबकि उत्तर प्रदेश में कई बरसों से बीटीसी की ट्रेनिंग ही बंद थी. अब ट्रेनिंग शुरू हुई है मगर एक साल में लगभग सात हज़ार बीटीसी शिक्षक ट्रेंड करने की क्षमता है. दूसरी ओर हर साल लगभग दस हज़ार टीचर रिटायर हो रहे हैं.
यानी एक अभियान चलाकर बड़ी संख्या में शिक्षकों की ट्रेनिंग और तैनाती की ज़रूरत है. ट्रेनिंग में यह बात भी शामिल हो कि टीचर बच्चों को पीटे और धमकाए बिना पढ़ने के लिए प्रेरित कर सकें.
इसके बाद यह भी ध्यान देने की ज़रूरत है कि स्कूलों का वातावरण ठीक हो यानी पर्याप्त रोशनी और हवादार कमरे हों, पेयजल, टॉयलेट, पुस्तकालय, टीचिंग सामग्री, खेल का मैदान और उपकरण हों. इन मामलों में उत्तर प्रदेश में अभी बहुत काम करने की ज़रूरत है.
क़ानून को लागू करने के लिए राज्यों को तीन साल का समय दिया गया है जिसमें स्कूलों के लिए सक्षम प्रबंधकीय ढांचा खड़ा किया जाना है. बताया जाता है कि विकसित राज्यों में एक विकेंद्रित प्रशासनिक मशीनरी है जो स्थानीय स्तर पर स्कूलों की मॉनीटरिंग करती है.
राज्य में औसतन आधे शिक्षक किसी न किसी कारण से स्कूलकार्य से ग़ायब रहते हैं. स्कूलों की संख्या दोगुनी हो गई है लेकिन सुपरवाइज़री स्टाफ़ नहीं है.
जवाबदेही की कमी
भ्रष्टाचार बढ़ गया है. बेसिक शिक्षा अधिकारी केवल मंत्री के प्रशासनिक नियंत्रण में हैं और वहां भी रिश्वत देकर तबादले-नियुक्तियां होती हैं. नतीजतन शायद उत्तर प्रदेश एक अकेला राज्य है जहां मिड-डे मील और बिल्डिंग निर्माण के अलावा टीचरों के तबादले में भी रिश्वत ली जाती है.
पिछड़े इलाकों में बच्चों को स्कूलों तक लाना एक चुनौती है
अन्य राज्यों की तरह यहाँ सरकार प्राइमरी शिक्षा ज़िला परिषद या शहरी स्थानीय निकायों को देने को तैयार नहीं. सरकार ऐसा कोई प्रशासनिक ढांचा नहीं बना रही जिससे टीचरों को पूरे समय पढ़ाने के लिए बाध्य किया जा सके.
नए क़ानून में यह व्यवस्था है कि टीचरों से चुनाव और जनगणना को छोड़ और काम न लिए जाएँ. इसका मतलब यह कि राज्य को अन्य कार्यों के लिए दूसरे स्टाफ़ रखने होंगे.
नए क़ानून में सरकार पर ज़िम्मेदारी डाली गई है कि निजी स्कूल अपने यहाँ 25 फ़ीसदी सीटें पड़ोस के निर्धन बच्चों के लिए रखें. दाख़िले में कोई अनुदान न लें और माँ-बाप या बच्चों का स्क्रीनिंग टेस्ट न लें. मगर इसको क्रियान्वित करने के लिए उत्तर प्रदेश में कोई मशीनरी नहीं है.
यूनिसेफ लखनऊ में शिक्षा विशेषज्ञ विनोबा गौतम कहते हैं, ''मुझे लगता है कि सरकार को कमर कसना पडेगा और कसना चाहिए ,लेकिन मै सहमत हूँ कि आज के दिन में सरकार अनभिज्ञ है कि आने वाले दिनों में उन्हें कौन सी चुनौतियों का सामना करना पडेगा. ''
लेकिन उत्तर प्रदेश में सर्व शिक्षा अभियान के निदेशक गांगुली कहते हैं, ''कॉमन यानि एक समान स्कूल की संकल्पना अब से चालीस वर्ष पहले कोठारी आयोग ने किया था. तब से किसी न किसी किसी कारणवश इसका क्रियान्वयन नही किया जा सका. कम से कम यह पहला कदम है कि हम कॉमन स्कूल की ओर अग्रसर हो रहे हैं.
आने वाले दिनों में अगर हम परिषदीय विद्यालयों में गुणवत्ता युक्त परिवेश, पर्याप्त सुविधाएं और छात्रों के अनुपात से शिक्षक सुनिश्चित कर सकें तो एक पड़ोस में रहने वाले सभी लोग अपने बच्चों को इन स्कूलों में भेजेंगे.''
एक हकीकत है कि सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर ठीक न होने से संपन्न लोग अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढाते हैं. अब केवल गरीब लोग ही अपने बच्चे सरकारी स्कूलों में भेजते हैं.
एक अध्ययन के मुताबिक इसका मतलब है कि इन स्कूलों में ज्यादातर बच्चे दलित और मुसिलम समुदायों के हैं. इस लिए सबसे ज्यादा लाभ इन्ही बच्चों को मिलेगा.
इस लिहाज से इस नए कानून को प्रगतिशील और क्रांतिकारी भी कहा जा रहा है. लेकिन कई लोग यह कहकर आलोचना भी करते हैं कि यह एक समान शिक्षा के बजाय दोहरी व्यवस्था को मान्या देता है
लाइलाज बीमारी से पीढ़ित दो बहनें
फिरोज़ाबाद के एक ग़रीब मुस्लिम परिवार में जन्मी दो बहनें एक लाइलाज बीमारी से पीढ़ित हैं। उनकी ज़िंदगी बिस्तर पर ही गुज़र रही है। पर इस लाचारी में भी इन दोनों बहनों की ज़िंदादिली काबिले तारीफ है। राशि और सोनम की उम्र 18 और 13 साल है। वक्त के साथ ये बड़ी ज़रूर हुईं पर इनका शरीर नहीं बढ़ा। ये दोनों बहनें ऐसी बीमारी से पीड़ित हैं जिसका मेडिकल साइंस में कोई इलाज नहीं है। इन दोनों के शरीर का विकास सिर्फ ढाई साल के बच्चे जितना ही हो पाया है। इसके बावजूद राशि और सोनम के चेहरे पर मुस्कराहट के सिवा और कुछ नहीं है। इनके चेहरों पर दर्द या शिकन कहीं दिखाई नहीं देती। दोनों बहनें ज़िंदगी के हर पल का आनंद ले रही हैं। दोनों को टीवी सीरीयल देखना बेहद पसंद है और बालिका वधू इनका सबसे फेवरिट सीरियल है। फिल्मी हीरो में सलमान खान और शाहरुख खान की ये दोनों ही फैन हैं। इनके फिल्मी गाने इनको बहुत पसंद हैं। इनकी पसंदीदा हीरोइन करीना और कैटरीना कैफ हैं। दोनों की दिली ख्वाहिश है करीना और कैटरीना से मुलाकात करने की। जिन मुश्किलों से बड़े-बडे टूट जाते हैं उनसे ये दोनों बहनें बहादुरी से मुकाबला कर रही हैं। राशि और सोनम के ज़िंदगी के इसी जज़्बे को हम सलाम करते हैं।
चारित्रिक मूल्यों का विकास
चारित्रिक मूल्यों का विकास जो कष्ट सहना नहीं जानता या उसके लिए तैयार नहीं है, उसे विकास का सपना नहीं देखना चाहिए। हर बड़े काम के लिए कष्ट उठाना पड़ता है, रिस्क लेनी पड़ती है। सांस्कृतिक मूल्यों का विकास, राष्ट्रीय और चारित्रिक मूल्यों का विकास, ये सब महलों में बैठकर सुख भोगते हुए नहीं किए जा सकते। इसे तो झोपडियों में रहकर, कष्ट सहकर ही किया जा सकता है। इसलिए अहिंसा के भव्य प्रासाद में प्रवेश करना है, अहिंसा को जीना है तो सबसे पहले उसके प्रथम दरवाजे में प्रवेश करें। राजस्थानी भाषा में यह सतपोलिया यानी सात द्वारों वाला मकान है। अहिंसा के चार दरवाजे हैं। पहला क्षांति या सहिष्णुता, दूसरा आकिंचन्य या अनासक्ति, तीसरा है सरलता और चौथा है मृदुता, कोमलता, करूणा और संवेदनशीलता, इन चारों से गुजरने के बाद ही अहिंसा के साक्षात् दर्शन हो सकते हैं, हमारी मुश्किल यह है कि बिना इन दरवाजों में प्रवेश किए हम अहिंसा तक पहुंचना चाहते हैं। ऎसी स्थिति में सफलता कैसे मिले? सब लोग बातों पर चिंतन करें और इन दरवाजों में प्रवेश करने की अर्हता और योग्यता अर्जित करने का प्रयत्न करें। जब तक यह प्रवेश पत्र नहीं पा लेते, अहिंसा तक पहुंचने की आशा न करें। शांतिपूर्ण जीवन और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व, जिनकी आज पूरे विश्व में चर्चा है, वह सम्भव नहीं हो पा रहा है, क्योंकि क्षांति के दरवाजों में प्रवेश नहीं हो पा रहा है। बिना अर्हता और योग्यता के सीधे प्रवेश करना चाहते हैं, यह सम्भव नहीं है। अगर प्रवेश द्वार में प्रविष्ट होने की योग्यता और क्षमता हासिल हो जाए तो एक नए विश्व की कल्पना, जिसमें शांति होगी, सहिष्णुता होगी, सामंजस्य होगा, सम्भव हो सकेगी।
वकीलों के आंदोलन से ठहरा पश्चिमी उप्र
मेरठ/मुरादाबाद/गाजियाबाद/अलीगढ़। प.उप्र में हाईकोर्ट बेंच स्थापना की मांग को लेकर मेरठ, मुरादाबाद, गाजियाबाद और अलीगढ़ में अभूतपूर्व बंद रहा। पिछले 28 वर्षो से लगातार चल रहे आंदोलन में पहली बार जनता भी वकीलों के साथ खड़ी नजर आयी। इस दौरान वकीलों ने नया गाजियाबाद रेलवे स्टेशन पर शालीमार एक्सप्रेस रोक दी, वहीं कई स्थानों पर जाम भी लगाया। इतना ही नहीं, कई दुकानों को जबरन बंद कराया गया। मुरादाबाद में अधिवक्ताओं ने दिल्ली से गुवाहटी जाने वाली राजधानी एक्सप्रेस मुरादाबाद जंक्शन पर रोककर प्रदर्शन किया। उधर, अधिवक्ताओं ने अलीगढ़ में दीवानी कचहरी के बाहर रास्ता जाम कर टायर फूंक कर गुस्से का इजहार किया। इसके बाद अधिवक्ता सीमा फाटक के पास दिल्ली-हावड़ा ट्रैक मालगाड़ी को रोककर इंजन पर चढ़ गए। आक्रोशित अधिवक्ताओं के प्रदर्शन के चलते रीवा एक्सप्रेस को स्टेशन पर ही करीब 20 मिनट तक रोकना पड़ा। आंदोलन के चलते पउप्र में परिवहन सेवा भी बाधित रही।
मेरठ कार्यालय के अनुसार गुरुवार को दिल्ली-देहरादून, मेरठ बदायूं व लखनऊ राज मार्गो के अलावा मुख्य सम्पर्क मार्गो, बाजारों, मंडी, शिक्षण संस्थाओं, पेट्रोल पम्प, गैस एजेंसी, नर्सिग होम, क्लीनिक, दवाघरों व व्यापारिक प्रतिष्ठानों में सन्नाटा छाया रहा। बसों, ट्रकों व टेम्पुओं के पहिये थमे रहे। बंद कराने को वकीलों, व्यापारी नेताओं व राजनीतिक दलों की टोलियां सुबह से ही बाजारों में निकल गयी थी परन्तु लोगों ने अपने प्रतिष्ठान स्वेच्छा से ही बंद कर दिये थे। वैली बाजार, हापुड़ रोड व सदर में इक्का-दुक्का दुकानों को बंद कराने को नोंकझोंक हुई। इस दौरान वकीलों ने 12 स्थानों को चिन्हित कर चक्का जाम किया। वकीलों ने प्रात: पांच बजे से भैंसाली मैदान व सोहराब गेट अड्डों की नाकेबंदी कर बसों की आवाजाही रोक दी थी। व्यापारी, शिक्षक व छात्र संगठनों के पदाधिकारियों के अलावा सभी दलों के नेता भी बंद सफल बनाने में जुटे रहे। बेगमपुल पर विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों ने मानव श्रृंखला बनाई गई। सपाइयों ने केन्द्र सरकार का पुतला फूंका। संघर्ष समिति के चेयरमैन जीएस धामा ने बताया कि आंदोलन की अगली रणनीति तय करने को केन्द्रीय संघर्ष समिति की बैठक 19 सितम्बर को नोएडा में होगी। बागपत में राष्ट्र वंदना चौक पर वकीलों ने सुबह से ही जाम लगा दिया। बाजार और सड़कें सूनी रहीं। बड़ौत और खेकड़ा में वकीलों ने ट्रेन रोकी और जुलूस निकालकर धरना दिया। बुलंदशहर में दोपहर बाद वकीलों ने हड़ताल खत्म कर दी। सहारनपुर में भी बंदी का व्यापक असर दिखा। मुजफ्फराबाद से निर्दलीय विधायक इमरान मसूद और भाजपा के शहर विधायक राघव लखनपाल शर्मा ने तो बेंच के लिए इस्तीफे तक की पेशकश कर दी। मुजफ्फरनगर में दुकाने बंद कराने को लेकर कहीं कहीं झड़प भी हुई। वहीं बिजनौर में वोडाफोन कंपनी का स्थानीय कार्यालय खुला मिलने पर गुस्साए वकीलों ने शीशे तोड़ दिए तथा एक कर्मचारी की पिटाई कर दी।
गाजियाबाद कार्यालय के अनुसार बार एसोसिएशन के सचिव के नेतृत्व में वकीलों व अन्य नेताओं की एक टोली नया गाजियाबाद रेलवे स्टेशन पर पहुंची और वहां शालीमार एक्सप्रेस को रोक दिया। उसके बाद सभी लोग अनाज मंडी पर एकत्र हुए और बाजार बंद कराए। इन लोगों ने घंटाघर, गोल मार्केट, दिल्ली गेट, डासना गेट, तुराबनगर, गांधीनगर समेत सभी मार्केट पूरी तरह से बंद करा दिए। इस दौरान कई दुकानदारों को वकीलों की पिटाई का शिकार होना पड़ा। इस तरह कई स्थानों पर झड़प हुई। अधिवक्ताओं ने बाजार बंद कराने के बाद प्रमुख स्थानों और चौराहों पर जाम-प्रदर्शन किया।
मुरादाबाद कार्यालय के अनुसार मंगलवार और बुधवार को यहां अधिवक्ता न्यायिक कार्य से विरत रहे। इसके बाद गुरुवार के लिए बाजार बंद का कार्यक्रम निरस्त करके दि बार एसोसिएशन एवं लाइब्रेरी की बैठक में रेल चक्का जाम का फैसला लिया था। तयशुदा कार्यक्रम के तहत गुरुवार को मध्याह्न में काफी संख्या में एसोसिएशन के सदस्य अधिवक्ता जंक्शन पहुंच गए। दिल्ली से गुवाहटी जाने वाली राजधानी एक्सप्रेस को अधिवक्ताओं ने आते ही रोक लिया। कई अधिवक्ता तो पटरी पर लेट गए और कई इंजन पर चढ़ गए। जमकर नारेबाजी के बीच अपनी मांग को उन्होंने दोहराया। जहां अधिवक्ताओं ने ट्रेन आधे घंटे रोके रखने का दावा किया, वहीं एडीआरएम एनपी सिंह का कहना है कि ट्रेन का यहां पांच मिनट का स्टापेज है, उतनी ही देर ट्रेन रुकी।
मेरठ कार्यालय के अनुसार गुरुवार को दिल्ली-देहरादून, मेरठ बदायूं व लखनऊ राज मार्गो के अलावा मुख्य सम्पर्क मार्गो, बाजारों, मंडी, शिक्षण संस्थाओं, पेट्रोल पम्प, गैस एजेंसी, नर्सिग होम, क्लीनिक, दवाघरों व व्यापारिक प्रतिष्ठानों में सन्नाटा छाया रहा। बसों, ट्रकों व टेम्पुओं के पहिये थमे रहे। बंद कराने को वकीलों, व्यापारी नेताओं व राजनीतिक दलों की टोलियां सुबह से ही बाजारों में निकल गयी थी परन्तु लोगों ने अपने प्रतिष्ठान स्वेच्छा से ही बंद कर दिये थे। वैली बाजार, हापुड़ रोड व सदर में इक्का-दुक्का दुकानों को बंद कराने को नोंकझोंक हुई। इस दौरान वकीलों ने 12 स्थानों को चिन्हित कर चक्का जाम किया। वकीलों ने प्रात: पांच बजे से भैंसाली मैदान व सोहराब गेट अड्डों की नाकेबंदी कर बसों की आवाजाही रोक दी थी। व्यापारी, शिक्षक व छात्र संगठनों के पदाधिकारियों के अलावा सभी दलों के नेता भी बंद सफल बनाने में जुटे रहे। बेगमपुल पर विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों ने मानव श्रृंखला बनाई गई। सपाइयों ने केन्द्र सरकार का पुतला फूंका। संघर्ष समिति के चेयरमैन जीएस धामा ने बताया कि आंदोलन की अगली रणनीति तय करने को केन्द्रीय संघर्ष समिति की बैठक 19 सितम्बर को नोएडा में होगी। बागपत में राष्ट्र वंदना चौक पर वकीलों ने सुबह से ही जाम लगा दिया। बाजार और सड़कें सूनी रहीं। बड़ौत और खेकड़ा में वकीलों ने ट्रेन रोकी और जुलूस निकालकर धरना दिया। बुलंदशहर में दोपहर बाद वकीलों ने हड़ताल खत्म कर दी। सहारनपुर में भी बंदी का व्यापक असर दिखा। मुजफ्फराबाद से निर्दलीय विधायक इमरान मसूद और भाजपा के शहर विधायक राघव लखनपाल शर्मा ने तो बेंच के लिए इस्तीफे तक की पेशकश कर दी। मुजफ्फरनगर में दुकाने बंद कराने को लेकर कहीं कहीं झड़प भी हुई। वहीं बिजनौर में वोडाफोन कंपनी का स्थानीय कार्यालय खुला मिलने पर गुस्साए वकीलों ने शीशे तोड़ दिए तथा एक कर्मचारी की पिटाई कर दी।
गाजियाबाद कार्यालय के अनुसार बार एसोसिएशन के सचिव के नेतृत्व में वकीलों व अन्य नेताओं की एक टोली नया गाजियाबाद रेलवे स्टेशन पर पहुंची और वहां शालीमार एक्सप्रेस को रोक दिया। उसके बाद सभी लोग अनाज मंडी पर एकत्र हुए और बाजार बंद कराए। इन लोगों ने घंटाघर, गोल मार्केट, दिल्ली गेट, डासना गेट, तुराबनगर, गांधीनगर समेत सभी मार्केट पूरी तरह से बंद करा दिए। इस दौरान कई दुकानदारों को वकीलों की पिटाई का शिकार होना पड़ा। इस तरह कई स्थानों पर झड़प हुई। अधिवक्ताओं ने बाजार बंद कराने के बाद प्रमुख स्थानों और चौराहों पर जाम-प्रदर्शन किया।
मुरादाबाद कार्यालय के अनुसार मंगलवार और बुधवार को यहां अधिवक्ता न्यायिक कार्य से विरत रहे। इसके बाद गुरुवार के लिए बाजार बंद का कार्यक्रम निरस्त करके दि बार एसोसिएशन एवं लाइब्रेरी की बैठक में रेल चक्का जाम का फैसला लिया था। तयशुदा कार्यक्रम के तहत गुरुवार को मध्याह्न में काफी संख्या में एसोसिएशन के सदस्य अधिवक्ता जंक्शन पहुंच गए। दिल्ली से गुवाहटी जाने वाली राजधानी एक्सप्रेस को अधिवक्ताओं ने आते ही रोक लिया। कई अधिवक्ता तो पटरी पर लेट गए और कई इंजन पर चढ़ गए। जमकर नारेबाजी के बीच अपनी मांग को उन्होंने दोहराया। जहां अधिवक्ताओं ने ट्रेन आधे घंटे रोके रखने का दावा किया, वहीं एडीआरएम एनपी सिंह का कहना है कि ट्रेन का यहां पांच मिनट का स्टापेज है, उतनी ही देर ट्रेन रुकी।
संचार क्रांति
इन दिनों यह धारणा प्रचलन में है कि अच्छा लेखन वही है जिसका वाचन के साथ फर्क न किया जा सके। हिन्दी के साहित्यकार आए दिन बोलचाल की भाषा में साहित्य सृजन पर जोर देते हैं। समस्या यह है कि जब एक बार स्वचालित वाचन को अच्छे लेखन के रूप में स्वीकार कर लिया जाएगा तो इसमें यह भाव भी निहित है कि स्वचालित वाचन विश्वसनीय है। उसे पढ़ सकते हैं। किंतु पढ़ते धीमी गति से हैं और बोलते तेज गति से हैं। अथवा जहां पर हम धीमी गति से बोलते या सुनते हैं वहां पर भी धीमी गति से पढ़ते हैं। असल में हमारा दिमाग बोलने और सुनने के लिए तैयार हुआ था न कि पढ़ने और लिखने के लिए। भाषा की तुलना में हमारे लेखन की व्यवस्था ज्यादा जटिल है। बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि विपरीत है। भाषा के साथ आज भी भाषाशास्त्री संघर्ष कर रहे हैं। कम्प्यूटर भाषा का निश्चित व्याकरण अभी तक नहीं बन पाया है। लेखन और वाचन के बीच आज भी संघर्ष चल रहा है। हमें भूलना नहीं चाहिए कि ऑडियो रिकॉर्डिंग आने के पहले वक्तृता का कोई स्थायी प्रमाण नहीं था। सिर्फ सुनने या बोलने वाले के ऊपर कुछ देर तक असर रहता था।
इसके विपरीत कम्प्यूटर लेखन 'करो और फिर करो' की तरह है। इसके गर्भ से जो सामग्री निकलती है वह रूपान्तरित होकर सामने आती है। इसके प्रत्येक रूप को लंबी अवधि तक संरक्षित किया जा सकता है। लेखन का मर्म यह है कि उसे संरक्षित कर सकते हैं। मेनीपुलेट कर सकते हैं।इसमें बाद में सामग्री शामिल कर सकते हैं। यही कम्प्यूटर लेखन का कौशल है। लेखक अभ्यास, भूल और फीडवैक के जरिए सीखता है।वह सिर्फ जानने मात्र से नहीं सीखता।इसके विपरीत जब एकबार बोलने का हुनर आ जाता है तो बोलना जान जाते हैं।बोलने में जानना ही महत्वपूर्ण है। आज डिकटोफोन ने यह संभव कर दिया है कि आप अपना भाषण लिखित रूप में पढ़ सकते हैं।उसे संशोधित कर सकते हैं। कम्प्यूटर में कनवर्जन के कारण आप अपने भाषण को सुन सकते हैं, देख सकते हैं,पढ़ सकते हैं।जरूरत इस बात की है कि आपकी कम्प्यूटर पर मास्टरी हो।यह एक तरह से यूजर को मास्टर बनाने वाली बात है।
सभ्यता के इतिहास में यूजर मास्टर पहलीबार बना है। आज लेखन उच्च कोटि का हुनर है। भाषण उच्चकोटि का हुनर नहीं रहा। आज इन दोनों के ही प्रशिक्षण पर जोर दिया जा रहा है। किंतु तकनीकी विकास के क्रम में एक अन्तर्विरोध पैदा हुआ है।यह संभव है बच्चों को लेखन का अभ्यास ही न कराया जाए। तब शिक्षण का क्या होगा ? आर्थिक प्रयासों का क्या होगा ? क्या इसका परिणाम यह होगा कि बच्चे सिर्फ पढ़ेंगे ? अथवा शिक्षण में लेखन और रीडिंग दोनों पर जोर होगा ? यह भी संभावना है कि खिचड़ी भाषा आ जाए। खिचड़ी भाषा और ध्वनियों को ही पढ़ाया जाएगा। उसी के जरिए सिखाया जाएगा। ऐसे में हम पाठ के मेनीपुलेशन से दो-चार होंगे।यह भी संभावना व्यक्त की जा रही है कि लेखन का प्रशिक्षण पुराना काम हो जाएगा। इसी तरह वक्तृता में परिवर्तन आने शुरू हो चुके हैं।वर्चुअल लेखन की तरह वर्चुअल भाषण के युग का श्रीगणेश हो गया है।वर्चुअल भाषण के कारण गद्य कला के लोप की संभावनाएं बढ़ गई हैं।हमने लेखन के कारण निबंध गद्य के विभिन्न रूपों को जन्म दिया। उसे लिखा। पढ़ा।किंतु वर्चुअल वाचन के युग में यह संभव नहीं होगा।आज हालात बदल गए हैं नयी तकनीक सांस्कृतिक संचय कर रही है। सूचना की खान तैयार कर रही है।ऐसे में सभ्यता की बुनियादी प्रकृति में भी परिवर्तन आया है। हम लेखन से 'स्काई लेखन' के युग में पहुँच गए हैं।यह तीव्रगति का लेखन है।इसमें मेनीपुलेशन की अनंत संभावनाएं हैं।यह ऑन लाइन लेखन है। डिजिटल पाठ है। वह वाचिक सामग्री को तेजी से रूपान्तरित कर रहा है। इसने लेखन के क्षेत्र में स्पीड, संभावना और अंतर-संपर्क को बुनियादी तत्व बना दिया है। लेखन के हुनर के अनेक तत्वों को कम्प्यूटर ने आत्मसात कर लिया है। स्मृति के बहुत सारे लक्षण अपने अंदर समाहित कर लिए हैं। इसने हमें 'फिजिकल पुस्तक' यानी 'पी-बुक' के युग से निकालकर 'वर्चुअल बुक' या 'वी बुक' के दौर में फेंक दिया है।यह वर्चुअल वर्ल्ड है।इसकी समस्याएं अलग हैं।
'वी बुक' में वह सब है जो 'पी-बुक' में था।इसके अलावा इसकी प्रतियां सहज ही बगैर किसी खास लागत के तैयार हो सकती हैं।'वी बुक ' को आप डाउनलोड कर सकते हैं।इसके पाठक सब जगह हैं।'वी बुक' के कारण लेखक-प्रकाशक संबंधों में बदलाव आया है।रॉयल्टी,प्रकाशन रायल्टी की अवधि, आदि नई समस्याएं सामने आ गई हैं। प्रकाशक को मुद्रित पुस्तक छापने का हक है।डिजिटल पुस्तक प्रकाशित करने का हक नहीं है। डिजिटल प्रकाशन की समस्याओं पर हमारे यहां अभी सोचना शुरू नहीं हुआ है। डिजिटल युग में लेखक के अधिकारों के बारे में हमे सोचना होगा। 'वी बुक' के कारण पुस्तकालय की भी प्रकृति बदलेगी।अभी हमारे पुस्तकालयों में पुस्तक होती है। किंतु 'वी बुक' के कारण इसकी प्रतिलिपि आसानी से हासिल कर सकते हैं। इसकी कीमत भी कम आएगी। असल में यह 'प्रिण्टिंग रीडिंग मोड' से 'राइटिंग रीडिंग मोड ' में रूपान्तरण है। पुस्तक का जन्म वस्तु के स्वामित्व के दौर में हुआ। जबकि 'वी बुक' का युग 'रेंटिंग' या भाड़े का युग है। 'वी बुक ' के दौर में यह संभव है कि 'वी बुक' खरीदकर पढ़ो या उसका पाठ खरीदकर पढ़ो ,या किराए पर पढ़ो।भविष्य में क्या होगा कोई कुछ नहीं जानता। सवाल यह उठता है कि इस परिवर्तन प्रक्रिया में जनमाध्यमों के पास क्या बचा रह जाएगा ?
इसके विपरीत कम्प्यूटर लेखन 'करो और फिर करो' की तरह है। इसके गर्भ से जो सामग्री निकलती है वह रूपान्तरित होकर सामने आती है। इसके प्रत्येक रूप को लंबी अवधि तक संरक्षित किया जा सकता है। लेखन का मर्म यह है कि उसे संरक्षित कर सकते हैं। मेनीपुलेट कर सकते हैं।इसमें बाद में सामग्री शामिल कर सकते हैं। यही कम्प्यूटर लेखन का कौशल है। लेखक अभ्यास, भूल और फीडवैक के जरिए सीखता है।वह सिर्फ जानने मात्र से नहीं सीखता।इसके विपरीत जब एकबार बोलने का हुनर आ जाता है तो बोलना जान जाते हैं।बोलने में जानना ही महत्वपूर्ण है। आज डिकटोफोन ने यह संभव कर दिया है कि आप अपना भाषण लिखित रूप में पढ़ सकते हैं।उसे संशोधित कर सकते हैं। कम्प्यूटर में कनवर्जन के कारण आप अपने भाषण को सुन सकते हैं, देख सकते हैं,पढ़ सकते हैं।जरूरत इस बात की है कि आपकी कम्प्यूटर पर मास्टरी हो।यह एक तरह से यूजर को मास्टर बनाने वाली बात है।
सभ्यता के इतिहास में यूजर मास्टर पहलीबार बना है। आज लेखन उच्च कोटि का हुनर है। भाषण उच्चकोटि का हुनर नहीं रहा। आज इन दोनों के ही प्रशिक्षण पर जोर दिया जा रहा है। किंतु तकनीकी विकास के क्रम में एक अन्तर्विरोध पैदा हुआ है।यह संभव है बच्चों को लेखन का अभ्यास ही न कराया जाए। तब शिक्षण का क्या होगा ? आर्थिक प्रयासों का क्या होगा ? क्या इसका परिणाम यह होगा कि बच्चे सिर्फ पढ़ेंगे ? अथवा शिक्षण में लेखन और रीडिंग दोनों पर जोर होगा ? यह भी संभावना है कि खिचड़ी भाषा आ जाए। खिचड़ी भाषा और ध्वनियों को ही पढ़ाया जाएगा। उसी के जरिए सिखाया जाएगा। ऐसे में हम पाठ के मेनीपुलेशन से दो-चार होंगे।यह भी संभावना व्यक्त की जा रही है कि लेखन का प्रशिक्षण पुराना काम हो जाएगा। इसी तरह वक्तृता में परिवर्तन आने शुरू हो चुके हैं।वर्चुअल लेखन की तरह वर्चुअल भाषण के युग का श्रीगणेश हो गया है।वर्चुअल भाषण के कारण गद्य कला के लोप की संभावनाएं बढ़ गई हैं।हमने लेखन के कारण निबंध गद्य के विभिन्न रूपों को जन्म दिया। उसे लिखा। पढ़ा।किंतु वर्चुअल वाचन के युग में यह संभव नहीं होगा।आज हालात बदल गए हैं नयी तकनीक सांस्कृतिक संचय कर रही है। सूचना की खान तैयार कर रही है।ऐसे में सभ्यता की बुनियादी प्रकृति में भी परिवर्तन आया है। हम लेखन से 'स्काई लेखन' के युग में पहुँच गए हैं।यह तीव्रगति का लेखन है।इसमें मेनीपुलेशन की अनंत संभावनाएं हैं।यह ऑन लाइन लेखन है। डिजिटल पाठ है। वह वाचिक सामग्री को तेजी से रूपान्तरित कर रहा है। इसने लेखन के क्षेत्र में स्पीड, संभावना और अंतर-संपर्क को बुनियादी तत्व बना दिया है। लेखन के हुनर के अनेक तत्वों को कम्प्यूटर ने आत्मसात कर लिया है। स्मृति के बहुत सारे लक्षण अपने अंदर समाहित कर लिए हैं। इसने हमें 'फिजिकल पुस्तक' यानी 'पी-बुक' के युग से निकालकर 'वर्चुअल बुक' या 'वी बुक' के दौर में फेंक दिया है।यह वर्चुअल वर्ल्ड है।इसकी समस्याएं अलग हैं।
'वी बुक' में वह सब है जो 'पी-बुक' में था।इसके अलावा इसकी प्रतियां सहज ही बगैर किसी खास लागत के तैयार हो सकती हैं।'वी बुक ' को आप डाउनलोड कर सकते हैं।इसके पाठक सब जगह हैं।'वी बुक' के कारण लेखक-प्रकाशक संबंधों में बदलाव आया है।रॉयल्टी,प्रकाशन रायल्टी की अवधि, आदि नई समस्याएं सामने आ गई हैं। प्रकाशक को मुद्रित पुस्तक छापने का हक है।डिजिटल पुस्तक प्रकाशित करने का हक नहीं है। डिजिटल प्रकाशन की समस्याओं पर हमारे यहां अभी सोचना शुरू नहीं हुआ है। डिजिटल युग में लेखक के अधिकारों के बारे में हमे सोचना होगा। 'वी बुक' के कारण पुस्तकालय की भी प्रकृति बदलेगी।अभी हमारे पुस्तकालयों में पुस्तक होती है। किंतु 'वी बुक' के कारण इसकी प्रतिलिपि आसानी से हासिल कर सकते हैं। इसकी कीमत भी कम आएगी। असल में यह 'प्रिण्टिंग रीडिंग मोड' से 'राइटिंग रीडिंग मोड ' में रूपान्तरण है। पुस्तक का जन्म वस्तु के स्वामित्व के दौर में हुआ। जबकि 'वी बुक' का युग 'रेंटिंग' या भाड़े का युग है। 'वी बुक ' के दौर में यह संभव है कि 'वी बुक' खरीदकर पढ़ो या उसका पाठ खरीदकर पढ़ो ,या किराए पर पढ़ो।भविष्य में क्या होगा कोई कुछ नहीं जानता। सवाल यह उठता है कि इस परिवर्तन प्रक्रिया में जनमाध्यमों के पास क्या बचा रह जाएगा ?
मंगलवार, 1 सितंबर 2009
फिरोज़ाबाद संसदीय निर्वाचन क्षेत्र
(परिसीमन आयोग के अनुसार)
जिला - फिरोज़ाबाद
संसदीय निर्वाचन क्षेत्र उत्तर प्रदेश
क्षेत्र का विस्तार विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र के सन्दर्भ में
फिरोज़ाबाद
95-टुन्डला (अ0जा0), 96-जसराना, 97-फिरोजाबाद, 98-शिकोहाबाद और 99-सिरसागंज ।
उत्तर प्रदेश राज्य संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों की सूची
(परिसीमन आयोग के अनुसार)
जिला - फिरोज़ाबाद
संसदीय निर्वाचन क्षेत्र उत्तर प्रदेश
क्षेत्र का विस्तार विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र के सन्दर्भ में
फिरोज़ाबाद
95-टुन्डला (अ0जा0), 96-जसराना, 97-फिरोजाबाद, 98-शिकोहाबाद और 99-सिरसागंज ।
उत्तर प्रदेश राज्य संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों की सूची
फ़िरोज़ाबाद मुग़ल काल से बसा भारत के उत्तर प्रदेश प्रान्त का एक जिला है। यह शहर चूड़ियों के निर्माण के लिये मशहूर है! शहर फीरोजाबाद आगरा से 40 किलोमीटर और राजधानी दिल्ली से 250 किलोमीटर की दुरी पर पूरब की तरफ स्थित है उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनउ यहां से लगभग 250 किमी पुरब की तरफ है फिरोज़ाबाद ज़िले के अन्तर्गत दो कस्बे टूंडला और शिकोहाबाद आते हैं. टुंडला पश्चिम तथा शिकोहाबा्द शहर के पूरब में स्थित हैं इस शहर को फीरोज़शाह तुग़लक़ ने बसाया था फीरोज़ाबाद में चूडीयों का कारोबार मुख्यता से होता है यहाँ पर आप रंग बिरंगी चुडियों के ठेले अपने चारों ओर देख सकते हैं यहां की फेकेटरियों से निकलने वाला धुआं यहां के लोगों को बीमारियों का तोहफा तो देता ही है ताज की खूबसूरत इमारत को भी नुक़सान पहुंचाता है इस प्रगति के दौर मे भी यहां के अक्सर कारखाने और भट्टियां कोयले से ही चलती हैं जिनका धुआं यहां के लोगों के लिये खतरनाक और जानलेवा साबित हो रहा है इसी कारण यहां की अधिकांश आबादी दमा और टीबी जैसे रोगों से पीडित है इस शहर की आबो हवा गरम है यहां की आबादी बहुत घनी है यहां के ज्यादातर लोग कोरोबार से जुडे हैं घरों के अन्दर महिलाएं भी चूडियों पर पालिश और हिल लगाकर रोजगार अर्जित कर लेती हैं । बाल मज़दुरी यहां आम है सरकार तमाम प्रयासों के बावजूद उन पर आंकुश नहीं लगा सकी है
गुरुवार, 23 जुलाई 2009
jai bharat ,
ड्रेस कोड में दिखेंगे छात्र-छात्राएं
शिकोहाबाद nagar के एके कालेज में इस सत्र से छात्र-छात्राएं यूनीफॉर्म में ही दिखाई देंगे। आयोग से आए नए प्राचार्य ने आदेश जारी कर दिए हैं। वहीं अब शैक्षणिक माहौल सुधारने के लिए छात्र-छात्राओं को हर रोज उपस्थिति रजिस्टर में उपस्थिति दर्ज करानी होगी। वहीं शिक्षकों के लिए भी नियमित रूप से कक्षाओं में पढ़ाना जरूरी कर दिया गया है।
आयोग से आए प्राचार्य डा.आरके सिंह ने शैक्षणिक माहौल सुधारने का बीड़ा उठा लिया है। बीए, बीकॉम, एमए एवं एमकॉम के छात्रों के लिए कालेज में यूनीफार्म अनिवार्य कर दी है। यूनीफार्म में न आने वाले छात्र-छात्राओं को कालेज में प्रवेश नहीं दिया जाएगा। छात्रों के लिए सफेद कमीज व काली पेंट तथा छात्राओं के लिए सफेद सलवार-सूट एवं नीली चुनरी निर्धारित की गई है।
इधर शैक्षणिक माहौल सुधारने के लिए कालेज द्वारा एक पोस्टकार्ड भी मांगा है। दिसंबर के अंतिम सप्ताह में कालेज द्वारा इस पोस्टकार्ड के जरिए ही छात्र-छात्राओं के घरों पर सूचना भेजी जाएगी। इस सूचना को भेजे जाने के बाद भी जनवरी व फरवरी में सुधार न होने पर विवि परीक्षाओं से रोका जा रहा है। उपस्थिति का निरीक्षण खुद प्राचार्य डा. सिंह ही करेंगे।
वहीं कालेज में कक्षाओं ने पढ़ाने वाले शिक्षकों की भी लगाम कसी जाएगी। शिक्षकों को हर हालत में कालेज परिसर में समय-सारिणी से 15 मिनट पूर्व ही आना होगा। कालेज प्राचार्य डा. राम खिलाड़ी सिंह यादव का कहना है कि इसमें ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी। चाहे वह छात्र हो या शिक्षक। इस बाबत उन्होने कहा कि लगातार 15 दिन गैरहाजिर रहने वालों का प्रवेश निरस्त कर दिया जाएगा। नए सत्र में यूनीफार्म से छात्र-छात्राओं में समानता का भी संदेश जाएगा।
ड्रेस कोड में दिखेंगे छात्र-छात्राएं
शिकोहाबाद nagar के एके कालेज में इस सत्र से छात्र-छात्राएं यूनीफॉर्म में ही दिखाई देंगे। आयोग से आए नए प्राचार्य ने आदेश जारी कर दिए हैं। वहीं अब शैक्षणिक माहौल सुधारने के लिए छात्र-छात्राओं को हर रोज उपस्थिति रजिस्टर में उपस्थिति दर्ज करानी होगी। वहीं शिक्षकों के लिए भी नियमित रूप से कक्षाओं में पढ़ाना जरूरी कर दिया गया है।
आयोग से आए प्राचार्य डा.आरके सिंह ने शैक्षणिक माहौल सुधारने का बीड़ा उठा लिया है। बीए, बीकॉम, एमए एवं एमकॉम के छात्रों के लिए कालेज में यूनीफार्म अनिवार्य कर दी है। यूनीफार्म में न आने वाले छात्र-छात्राओं को कालेज में प्रवेश नहीं दिया जाएगा। छात्रों के लिए सफेद कमीज व काली पेंट तथा छात्राओं के लिए सफेद सलवार-सूट एवं नीली चुनरी निर्धारित की गई है।
इधर शैक्षणिक माहौल सुधारने के लिए कालेज द्वारा एक पोस्टकार्ड भी मांगा है। दिसंबर के अंतिम सप्ताह में कालेज द्वारा इस पोस्टकार्ड के जरिए ही छात्र-छात्राओं के घरों पर सूचना भेजी जाएगी। इस सूचना को भेजे जाने के बाद भी जनवरी व फरवरी में सुधार न होने पर विवि परीक्षाओं से रोका जा रहा है। उपस्थिति का निरीक्षण खुद प्राचार्य डा. सिंह ही करेंगे।
वहीं कालेज में कक्षाओं ने पढ़ाने वाले शिक्षकों की भी लगाम कसी जाएगी। शिक्षकों को हर हालत में कालेज परिसर में समय-सारिणी से 15 मिनट पूर्व ही आना होगा। कालेज प्राचार्य डा. राम खिलाड़ी सिंह यादव का कहना है कि इसमें ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी। चाहे वह छात्र हो या शिक्षक। इस बाबत उन्होने कहा कि लगातार 15 दिन गैरहाजिर रहने वालों का प्रवेश निरस्त कर दिया जाएगा। नए सत्र में यूनीफार्म से छात्र-छात्राओं में समानता का भी संदेश जाएगा।
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