शुक्रवार, 18 सितंबर 2009

उत्तर प्रदेशः सबको शिक्षा के नारे से कोसों दूर

आशीष पांच साल का बच्चा है. वह लखनऊ के डालीबाग़ इलाक़े में वसंत विहार प्राइवेट स्कूल में एक साल पढ़ चुका है इसलिए वह एबीसीडी और गिनती पढ़-लिख लेता है. आशीष को स्कूल में पढ़ना, खेलना और खाना अच्छा लगता है लेकिन अब वह स्कूल नहीं जाता, क्योंकि उसके पिता के पास स्कूल की दाख़िला फ़ीस और मासिक फ़ीस देने का पैसा नहीं है.
आशीष के पिता मनोज कुमार वर्मा एक प्राइवेट कंपनी में ड्राइवर हैं और उनके दो बच्चे हैं.
मनोज कुमार कहते हैं, "साढ़े तीन हज़ार वेतन है. 1500 रुपए किराया दे देता हूँ, पांच सौ रुपया दूध का. मेरे पास कुछ बचता ही नहीं कि बच्चों को पढ़ा सकूँ.''
बीबीसी विशेष
भारत सरकार हाल ही में सभी को मुफ़्त एवं अनिवार्य शिक्षा विधेयक ले कर आई है लेकिन क्या ये आसानी से लागू होगा. ज़मीनी सच्चाई को खोजने की कोशिश कर रहे हैं विभिन्न बीबीसी संवाददाता. पढ़िए, दूसरी कड़ी उत्तर प्रदेश से ...
मनोज की कोशिश है कि अब वो अपने बेटे को किसी सरकारी स्कूल में दाख़िल कर दें लेकिन सरकारी स्कूल में शिक्षा की गुणवत्ता से वो संतुष्ट नहीं हैं.
दूसरी दिक़्क़त यह है कि सरकारी व्यवस्था में छह साल से कम उम्र यानी नर्सरी और 14 साल से अधिक यानी हाईस्कूल की व्यवस्था नहीं है, जबकि ज़्यादातर निजी स्कूलों में नर्सरी में दाख़िल होने के बाद बच्चा इंटर पास करके निकलता है.
अधिकारियों का कहना है कि पिछले सात बरसों में सर्व शिक्षा अभियान के तहत इतना काम हुआ है कि अब उत्तर प्रदेश में ग्रामीण क्षेत्रों में बेसिक स्कूलों की कमी नहीं रह गई है. एक किलोमीटर की परिधि में प्राइमरी और दो किलोमीटर की परिधि में अपर प्राइमरी स्कूल खुल गए हैं. इन स्कूलों की संख्या बढ़ कर एक 1,95,940 हो गई है.
लेकिन शहरी क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों और शिक्षकों की बहुत कमी है. शहरी क्षेत्रों में लगभग 30 फ़ीसदी आबादी मलिन बस्तियों में रहती है, जहां स्कूल नहीं खुले. ज़मीने मंहगी हैं. पुराने स्कूल किराए के जीर्ण-शीर्ण भवनों में चल रहे हैं और किराया नगण्य होने से मकान मालिक उन्हें खाली कराना चाहते हैं.
राजधानी लखनऊ के नगर क्षेत्र में ही 30 वार्ड ऐसे हैं जहां बिल्डिंग न होने के कारण स्कूल नहीं हैं. यह समस्या मुरादाबाद, आगरा, फिरोज़ाबाद और अन्य शहरों में भी है. वर्ष 1998 के बाद से शहरी क्षेत्रों में अध्यापक तैनात नहीं हुए.
नए स्कूल खुलने और मिड डे मील के आकर्षण से स्कूलों में प्राइमरी स्कूलों में दाख़िले बढ़े हैं, लेकिन अपर प्राइमरी स्कूलों में उतने बच्चे नहीं जा रहे. यानी बड़ी तादाद में बच्चे आठवीं तक नहीं पहुंचते जो नए क़ानून का लक्ष्य है.
गुणवत्ता का सवाल
एक और बड़ी समस्या सरकारी स्कूलों की शिक्षा में गुणवत्ता सुधारने और उनको निजी स्कूलों के साथ समान स्तर पर लाने की है जिससे अमीर और ग़रीब गाँव और देहात के बच्चों की पढ़ाई के स्तर का भेद ख़त्म हो.
सरकार कुछ भी कर ले, जब तक अभिभावक जागरूक नहीं होंगे तब तक हालत नहीं बदलेंगे. जब तक अभिभावकों को बच्चों को स्कूल न भेजने के लिए सज़ा नहीं मिलेगी, वो जागरूक नहीं होंगे. आज 13 साल का बच्चा सौ रुपये मज़दूरी लाता है.
प्रिंसिपल सरला श्रीवास्तव
हकीक़त से रूबरू होने के लिए मैं बाराबंकी बहराइच मार्ग पर ग्रामीण क्षेत्रों में निजी और सरकारी स्कूल देखने गया. यह एक सुखद संयोग हो सकता है कि दोनों स्कूल खुले थे और टीचर क्लास में पढ़ा रहे थे.
प्राइमरी स्कूल सुरसंडा में एक से पांचवीं तक 276 बच्चे हैं जबकि केवल तीन नियमित और दो शिक्षामित्र टीचर हैं. यानी एक टीचर पर 55 बच्चे. स्कूल में कमरे कम हैं. क्लास एक और दो के बच्चे एक ही कमरे में बैठे थे. हालांकि तारीफ़ की बात है कि क्लासरूम को ऐसे चित्रों और पोस्टरों से सजाया गया था जो पढ़ने में सहायक हों.
एक अनुमान के मुताबिक उत्तर प्रदेश में छह से 14 साल की उम्र के क़रीब पौने छह करोड़ बच्चे हैं, इनमें से क़रीब पौने चार करोड़ सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं. बाक़ी या तो निजी स्कूलों में हैं या स्कूल से बाहर. सरकारी आकड़ों के अनुसार पिछले साल राज्य में तीन लाख छोटे बच्चे स्कूल से बाहर थे.
एक स्कूल की प्रिंसिपल, सरला श्रीवास्तव कहती हैं, ''सरकार कुछ भी कर ले, जब तक अभिभावक जागरूक नहीं होंगे तब तक हालत नहीं बदलेंगे. जब तक अभिभावकों को बच्चों को स्कूल न भेजने के लिए सज़ा नहीं मिलेगी, वो जागरूक नहीं होंगे. आज 13 साल का बच्चा सौ रुपये मज़दूरी लाता है. लड़कियों को वह समझते हैं कि पढ़ाई के बाद शादी कर देना है बस.''
छात्रवृत्ति के लालच में लड़कियों के दाख़िले बढ़े हैं. यह भी मालूम हुआ कि कई लोग अपने बच्चे का नाम सरकारी स्कूल में लिखा लेते हैं लेकिन उसे भेजते हैं किसी निजी स्कूल में. एक कारण यह है कि निजी स्कूल मान्यता प्राप्त नहीं है या फिर इसलिए भी ताकि सरकारी स्कूल वाली सुविधा भी मिलती रहे.
इसमें ग्राम प्रधान और अध्यापक दोनों का फ़ायदा है. इसे रोकने के लिए अब सरकार बच्चों की डिजिटल फोटोग्राफ़ी कराकर उन्हें एक पहचान नंबर देने जा रही है, यह पहचान हमेशा ऊंची क्लास तक छात्र के साथ रहेगी.
पास के शहाबपुर बाज़ार में कई निजी स्कूल हैं. पास पड़ोस के गाँव वाले रिक्शों पर अपने बच्चे यहाँ भेजते हैं और ऊंची फ़ीस भी देते हैं. ये वे अभिभावक हैं जो संपन्न हैं और पढ़ाई के प्रति जागरूक भी.
आज़ाद हायर सेकेंडरी स्कूल की टीचर रेशमा बानो कहती हैं कि निजी स्कूलों में शिक्षा का स्तर ज़्यादा अच्छा है इसलिए लोग वहां पैसा देकर भी पढ़ाते हैं, हालाँकि सरकार सरकारी स्कूलों में तमाम सुविधा भी दे रही है, वज़ीफ़ा भी ड्रेस और खाना भी. लेकिन वहाँ बच्चे ज़्यादा हैं और टीचर बहुत कम. वह भी खाना बनवाने और पोलियो में लगे रहते हैं. निजी स्कूलों की पढ़ाई का तरीका भी अलग है.
रोज़गारपरक शिक्षा
समस्या का एक और पहलू है कि पढ़-लिख लेने के बाद कोई शारीरिक श्रम वाला काम नहीं करना चाहता और बाबूगीरी की नौकरियां इतनी हैं नहीं. इसलिए कई माँ-बाप सोचते हैं कि पढ़ने के बजाय बच्चा खेत में ही काम करें.

शिक्षा को रोज़गारपरक बनाना भी एक अहम ज़रूरत है
बाराबंकी के बेसिक शिक्षा अधिकारी प्रवीण मणि त्रिपाठी कहते हैं कि सरकारी स्कूलों का माहौल बदलने के लिए शिक्षा को गुणवत्तापरक बनाकर उसमें व्यावसायिक शिक्षा को भी जोड़ना पड़ेगा.
उनका कहना है कि अगर सरकारी स्कूल उच्च तबके के बच्चों को अपने से जोड़ पाएं तो और लोग भी अपने बच्चे वहां पढ़ाने को प्रेरित होंगे.
सरकार ने निजी स्कूलों में 25 फ़ीसदी सीटें पड़ोस के ग़रीब बच्चों के लिए आरक्षित करने का क़ानून बनाया है लेकिन लखनऊ की सबसे बड़ी स्कूल श्रृंखला सिटी मॉन्टेसरी स्कूल के प्रबंधक जगदीश गांधी कहते हैं कि चूंकि सरकार प्रतिपूर्ति बहुत कम देगी इसलिए इन बच्चों का बोझ दूसरे बच्चों के अभिभावकों पर पड़ेगा.
जगदीश गांधी क़ानून के उस प्रावधान के भी ख़िलाफ़ हैं जिसमें क्लास एक से आठ तक कोई इम्तेहान न लेने और बिना रोक-टोक पास करते रहने की व्यवस्था है.
जगदीश गांधी के अनुसार सरकारी स्कूलों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वहां नीचे से ऊपर तक किसी की कोई जवाबदेही नहीं है.
मगर निजी स्कूलों पर नियंत्रण भी एक विकट समस्या होगी. इनकी संख्या उत्तर प्रदेश में लगभग 13 हज़ार है.
गुणवत्ता सुधारने के लिए सबसे ज़रूरी है पर्याप्त संख्या में शिक्षक. उत्तर प्रदेश में एक शिक्षक पर 51 बच्चों का औसत है जबकि राष्ट्रीय औसत 34 छात्रों पर एक शिक्षक का है.
संसाधनों का अभाव
उत्तर प्रदेश में अब भी 13,113 स्कूल ऐसे हैं जहां केवल एक शिक्षक उपलब्ध है. जिस दिन वह शिक्षक अवकाश पर हो या किसी अन्य सरकारी काम पर हो उस दिन समझें कि स्कूल बंद.

निजी संस्थान भले ही अंतरराष्ट्रीय मानकों के हो गए हों, पर बहुमत विद्यार्थी अभावों में पढ़ाई करने को मजबूर हैं.
यातायात के साधन और अन्य सुविधाएं न होने से सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में अध्यापक जाना नहीं चाहते, जबकि शहर और सड़क के करीब वाले स्कूलों में टीचर ज़्यादा हैं.
इसी तरह आर्थिक दृष्टि से संपन्न पश्चिमी ज़िलों में सरकारी स्कूलों में छात्र और शिक्षक ज़्यादा हैं, जबकि पूरब के ग़रीब ज़िलों में छात्र ज़्यादा और शिक्षक कम हैं.
आबादी के हिसाब से उत्तर प्रदेश में छस से 14 साल की उम्र के बच्चों की संख्या लगभग पौने छह करोड़ है. प्रदेश में इस समय तीन करोड़, 62 लाख 63 हज़ार बच्चे स्कूलों में पढ़ रहे हैं. निजी स्कूलों को मिलाकर भी बहुत से बच्चे स्कूलों से बाहर हैं.
आदर्श स्थिति में कम से कम 10 लाख शिक्षक होने चाहिए. वर्तमान में शिक्षकों के कुल स्वीकृत पद 4,06,607 हैं इनमें से लगभग एक तिहाई यानी 1,53,623 पद ख़ाली हैं. कमी को पूरा करने के लिए एक लाख 86 हज़ार शिक्षामित्र लगाए गए हैं.
नए क़ानून में केवल प्रशिक्षित शिक्षक को ही मान्यता दी गई है जबकि उत्तर प्रदेश में कई बरसों से बीटीसी की ट्रेनिंग ही बंद थी. अब ट्रेनिंग शुरू हुई है मगर एक साल में लगभग सात हज़ार बीटीसी शिक्षक ट्रेंड करने की क्षमता है. दूसरी ओर हर साल लगभग दस हज़ार टीचर रिटायर हो रहे हैं.
यानी एक अभियान चलाकर बड़ी संख्या में शिक्षकों की ट्रेनिंग और तैनाती की ज़रूरत है. ट्रेनिंग में यह बात भी शामिल हो कि टीचर बच्चों को पीटे और धमकाए बिना पढ़ने के लिए प्रेरित कर सकें.
इसके बाद यह भी ध्यान देने की ज़रूरत है कि स्कूलों का वातावरण ठीक हो यानी पर्याप्त रोशनी और हवादार कमरे हों, पेयजल, टॉयलेट, पुस्तकालय, टीचिंग सामग्री, खेल का मैदान और उपकरण हों. इन मामलों में उत्तर प्रदेश में अभी बहुत काम करने की ज़रूरत है.
क़ानून को लागू करने के लिए राज्यों को तीन साल का समय दिया गया है जिसमें स्कूलों के लिए सक्षम प्रबंधकीय ढांचा खड़ा किया जाना है. बताया जाता है कि विकसित राज्यों में एक विकेंद्रित प्रशासनिक मशीनरी है जो स्थानीय स्तर पर स्कूलों की मॉनीटरिंग करती है.
राज्य में औसतन आधे शिक्षक किसी न किसी कारण से स्कूलकार्य से ग़ायब रहते हैं. स्कूलों की संख्या दोगुनी हो गई है लेकिन सुपरवाइज़री स्टाफ़ नहीं है.
जवाबदेही की कमी
भ्रष्टाचार बढ़ गया है. बेसिक शिक्षा अधिकारी केवल मंत्री के प्रशासनिक नियंत्रण में हैं और वहां भी रिश्वत देकर तबादले-नियुक्तियां होती हैं. नतीजतन शायद उत्तर प्रदेश एक अकेला राज्य है जहां मिड-डे मील और बिल्डिंग निर्माण के अलावा टीचरों के तबादले में भी रिश्वत ली जाती है.

पिछड़े इलाकों में बच्चों को स्कूलों तक लाना एक चुनौती है
अन्य राज्यों की तरह यहाँ सरकार प्राइमरी शिक्षा ज़िला परिषद या शहरी स्थानीय निकायों को देने को तैयार नहीं. सरकार ऐसा कोई प्रशासनिक ढांचा नहीं बना रही जिससे टीचरों को पूरे समय पढ़ाने के लिए बाध्य किया जा सके.
नए क़ानून में यह व्यवस्था है कि टीचरों से चुनाव और जनगणना को छोड़ और काम न लिए जाएँ. इसका मतलब यह कि राज्य को अन्य कार्यों के लिए दूसरे स्टाफ़ रखने होंगे.
नए क़ानून में सरकार पर ज़िम्मेदारी डाली गई है कि निजी स्कूल अपने यहाँ 25 फ़ीसदी सीटें पड़ोस के निर्धन बच्चों के लिए रखें. दाख़िले में कोई अनुदान न लें और माँ-बाप या बच्चों का स्क्रीनिंग टेस्ट न लें. मगर इसको क्रियान्वित करने के लिए उत्तर प्रदेश में कोई मशीनरी नहीं है.
यूनिसेफ लखनऊ में शिक्षा विशेषज्ञ विनोबा गौतम कहते हैं, ''मुझे लगता है कि सरकार को कमर कसना पडेगा और कसना चाहिए ,लेकिन मै सहमत हूँ कि आज के दिन में सरकार अनभिज्ञ है कि आने वाले दिनों में उन्हें कौन सी चुनौतियों का सामना करना पडेगा. ''
लेकिन उत्तर प्रदेश में सर्व शिक्षा अभियान के निदेशक गांगुली कहते हैं, ''कॉमन यानि एक समान स्कूल की संकल्पना अब से चालीस वर्ष पहले कोठारी आयोग ने किया था. तब से किसी न किसी किसी कारणवश इसका क्रियान्वयन नही किया जा सका. कम से कम यह पहला कदम है कि हम कॉमन स्कूल की ओर अग्रसर हो रहे हैं.
आने वाले दिनों में अगर हम परिषदीय विद्यालयों में गुणवत्ता युक्त परिवेश, पर्याप्त सुविधाएं और छात्रों के अनुपात से शिक्षक सुनिश्चित कर सकें तो एक पड़ोस में रहने वाले सभी लोग अपने बच्चों को इन स्कूलों में भेजेंगे.''
एक हकीकत है कि सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर ठीक न होने से संपन्न लोग अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढाते हैं. अब केवल गरीब लोग ही अपने बच्चे सरकारी स्कूलों में भेजते हैं.
एक अध्ययन के मुताबिक इसका मतलब है कि इन स्कूलों में ज्यादातर बच्चे दलित और मुसिलम समुदायों के हैं. इस लिए सबसे ज्यादा लाभ इन्ही बच्चों को मिलेगा.
इस लिहाज से इस नए कानून को प्रगतिशील और क्रांतिकारी भी कहा जा रहा है. लेकिन कई लोग यह कहकर आलोचना भी करते हैं कि यह एक समान शिक्षा के बजाय दोहरी व्यवस्था को मान्या देता है

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