चारित्रिक मूल्यों का विकास जो कष्ट सहना नहीं जानता या उसके लिए तैयार नहीं है, उसे विकास का सपना नहीं देखना चाहिए। हर बड़े काम के लिए कष्ट उठाना पड़ता है, रिस्क लेनी पड़ती है। सांस्कृतिक मूल्यों का विकास, राष्ट्रीय और चारित्रिक मूल्यों का विकास, ये सब महलों में बैठकर सुख भोगते हुए नहीं किए जा सकते। इसे तो झोपडियों में रहकर, कष्ट सहकर ही किया जा सकता है। इसलिए अहिंसा के भव्य प्रासाद में प्रवेश करना है, अहिंसा को जीना है तो सबसे पहले उसके प्रथम दरवाजे में प्रवेश करें। राजस्थानी भाषा में यह सतपोलिया यानी सात द्वारों वाला मकान है। अहिंसा के चार दरवाजे हैं। पहला क्षांति या सहिष्णुता, दूसरा आकिंचन्य या अनासक्ति, तीसरा है सरलता और चौथा है मृदुता, कोमलता, करूणा और संवेदनशीलता, इन चारों से गुजरने के बाद ही अहिंसा के साक्षात् दर्शन हो सकते हैं, हमारी मुश्किल यह है कि बिना इन दरवाजों में प्रवेश किए हम अहिंसा तक पहुंचना चाहते हैं। ऎसी स्थिति में सफलता कैसे मिले? सब लोग बातों पर चिंतन करें और इन दरवाजों में प्रवेश करने की अर्हता और योग्यता अर्जित करने का प्रयत्न करें। जब तक यह प्रवेश पत्र नहीं पा लेते, अहिंसा तक पहुंचने की आशा न करें। शांतिपूर्ण जीवन और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व, जिनकी आज पूरे विश्व में चर्चा है, वह सम्भव नहीं हो पा रहा है, क्योंकि क्षांति के दरवाजों में प्रवेश नहीं हो पा रहा है। बिना अर्हता और योग्यता के सीधे प्रवेश करना चाहते हैं, यह सम्भव नहीं है। अगर प्रवेश द्वार में प्रविष्ट होने की योग्यता और क्षमता हासिल हो जाए तो एक नए विश्व की कल्पना, जिसमें शांति होगी, सहिष्णुता होगी, सामंजस्य होगा, सम्भव हो सकेगी।
शुक्रवार, 18 सितंबर 2009
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bahut acha
जवाब देंहटाएंbahut achchha
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