शुक्रवार, 18 सितंबर 2009

मृत जानवर की चर्बी से घी बनानेवालों का पर्दाफाश

फिरोज़ाबाद। खाने- पीने की चीजों में मिलावट का धंधा रुकने का नाम ही नहीं ले रहा और आए दिन ऐसे ठिकानों का पता चल रहा है जहां इस तरह के चंद रुपयों का नफा कमाने के लिए ये घिनौने काम कर रहे हैं। नगर मजिस्ट्रेट की अगुवाई में एक जांच दल ने बगदादनगर और ताड़ों वाली बगिया में छापा मारा और दो ऐसे लोगों को गिरफ्तार किया जो नकली घी बनाने का धंधा कर रहे थे। पुलिस ने इन दो लोगों को तो गिरफ्तार कर लिया पर बाकी लोग भाग निकले। जांच दल ने ये छापा एक शिकायत के बाद मारा था जिसके मुताबिक ये लोग नकली घी बनाने में चर्बी का इस्तेमाल करते थे। छापे में जानवरों की बहुत सी खालें,बडी तादात में कनस्तर नकली घी और घी बनाने में इस्तेमाल होने वाला सामान बरामद हुआ है। कढ़ाहों में उबलती चर्बी को देख जांच दल दंग रह गये। मरे जानवरों के अंग और चमड़े के ढेर भी मौके से बरामद हुए। पुलिस ने इस मामले में दो लोगों को गिरफ्तार कर लिया है।

उत्तर प्रदेशः सबको शिक्षा के नारे से कोसों दूर

आशीष पांच साल का बच्चा है. वह लखनऊ के डालीबाग़ इलाक़े में वसंत विहार प्राइवेट स्कूल में एक साल पढ़ चुका है इसलिए वह एबीसीडी और गिनती पढ़-लिख लेता है. आशीष को स्कूल में पढ़ना, खेलना और खाना अच्छा लगता है लेकिन अब वह स्कूल नहीं जाता, क्योंकि उसके पिता के पास स्कूल की दाख़िला फ़ीस और मासिक फ़ीस देने का पैसा नहीं है.
आशीष के पिता मनोज कुमार वर्मा एक प्राइवेट कंपनी में ड्राइवर हैं और उनके दो बच्चे हैं.
मनोज कुमार कहते हैं, "साढ़े तीन हज़ार वेतन है. 1500 रुपए किराया दे देता हूँ, पांच सौ रुपया दूध का. मेरे पास कुछ बचता ही नहीं कि बच्चों को पढ़ा सकूँ.''
बीबीसी विशेष
भारत सरकार हाल ही में सभी को मुफ़्त एवं अनिवार्य शिक्षा विधेयक ले कर आई है लेकिन क्या ये आसानी से लागू होगा. ज़मीनी सच्चाई को खोजने की कोशिश कर रहे हैं विभिन्न बीबीसी संवाददाता. पढ़िए, दूसरी कड़ी उत्तर प्रदेश से ...
मनोज की कोशिश है कि अब वो अपने बेटे को किसी सरकारी स्कूल में दाख़िल कर दें लेकिन सरकारी स्कूल में शिक्षा की गुणवत्ता से वो संतुष्ट नहीं हैं.
दूसरी दिक़्क़त यह है कि सरकारी व्यवस्था में छह साल से कम उम्र यानी नर्सरी और 14 साल से अधिक यानी हाईस्कूल की व्यवस्था नहीं है, जबकि ज़्यादातर निजी स्कूलों में नर्सरी में दाख़िल होने के बाद बच्चा इंटर पास करके निकलता है.
अधिकारियों का कहना है कि पिछले सात बरसों में सर्व शिक्षा अभियान के तहत इतना काम हुआ है कि अब उत्तर प्रदेश में ग्रामीण क्षेत्रों में बेसिक स्कूलों की कमी नहीं रह गई है. एक किलोमीटर की परिधि में प्राइमरी और दो किलोमीटर की परिधि में अपर प्राइमरी स्कूल खुल गए हैं. इन स्कूलों की संख्या बढ़ कर एक 1,95,940 हो गई है.
लेकिन शहरी क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों और शिक्षकों की बहुत कमी है. शहरी क्षेत्रों में लगभग 30 फ़ीसदी आबादी मलिन बस्तियों में रहती है, जहां स्कूल नहीं खुले. ज़मीने मंहगी हैं. पुराने स्कूल किराए के जीर्ण-शीर्ण भवनों में चल रहे हैं और किराया नगण्य होने से मकान मालिक उन्हें खाली कराना चाहते हैं.
राजधानी लखनऊ के नगर क्षेत्र में ही 30 वार्ड ऐसे हैं जहां बिल्डिंग न होने के कारण स्कूल नहीं हैं. यह समस्या मुरादाबाद, आगरा, फिरोज़ाबाद और अन्य शहरों में भी है. वर्ष 1998 के बाद से शहरी क्षेत्रों में अध्यापक तैनात नहीं हुए.
नए स्कूल खुलने और मिड डे मील के आकर्षण से स्कूलों में प्राइमरी स्कूलों में दाख़िले बढ़े हैं, लेकिन अपर प्राइमरी स्कूलों में उतने बच्चे नहीं जा रहे. यानी बड़ी तादाद में बच्चे आठवीं तक नहीं पहुंचते जो नए क़ानून का लक्ष्य है.
गुणवत्ता का सवाल
एक और बड़ी समस्या सरकारी स्कूलों की शिक्षा में गुणवत्ता सुधारने और उनको निजी स्कूलों के साथ समान स्तर पर लाने की है जिससे अमीर और ग़रीब गाँव और देहात के बच्चों की पढ़ाई के स्तर का भेद ख़त्म हो.
सरकार कुछ भी कर ले, जब तक अभिभावक जागरूक नहीं होंगे तब तक हालत नहीं बदलेंगे. जब तक अभिभावकों को बच्चों को स्कूल न भेजने के लिए सज़ा नहीं मिलेगी, वो जागरूक नहीं होंगे. आज 13 साल का बच्चा सौ रुपये मज़दूरी लाता है.
प्रिंसिपल सरला श्रीवास्तव
हकीक़त से रूबरू होने के लिए मैं बाराबंकी बहराइच मार्ग पर ग्रामीण क्षेत्रों में निजी और सरकारी स्कूल देखने गया. यह एक सुखद संयोग हो सकता है कि दोनों स्कूल खुले थे और टीचर क्लास में पढ़ा रहे थे.
प्राइमरी स्कूल सुरसंडा में एक से पांचवीं तक 276 बच्चे हैं जबकि केवल तीन नियमित और दो शिक्षामित्र टीचर हैं. यानी एक टीचर पर 55 बच्चे. स्कूल में कमरे कम हैं. क्लास एक और दो के बच्चे एक ही कमरे में बैठे थे. हालांकि तारीफ़ की बात है कि क्लासरूम को ऐसे चित्रों और पोस्टरों से सजाया गया था जो पढ़ने में सहायक हों.
एक अनुमान के मुताबिक उत्तर प्रदेश में छह से 14 साल की उम्र के क़रीब पौने छह करोड़ बच्चे हैं, इनमें से क़रीब पौने चार करोड़ सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं. बाक़ी या तो निजी स्कूलों में हैं या स्कूल से बाहर. सरकारी आकड़ों के अनुसार पिछले साल राज्य में तीन लाख छोटे बच्चे स्कूल से बाहर थे.
एक स्कूल की प्रिंसिपल, सरला श्रीवास्तव कहती हैं, ''सरकार कुछ भी कर ले, जब तक अभिभावक जागरूक नहीं होंगे तब तक हालत नहीं बदलेंगे. जब तक अभिभावकों को बच्चों को स्कूल न भेजने के लिए सज़ा नहीं मिलेगी, वो जागरूक नहीं होंगे. आज 13 साल का बच्चा सौ रुपये मज़दूरी लाता है. लड़कियों को वह समझते हैं कि पढ़ाई के बाद शादी कर देना है बस.''
छात्रवृत्ति के लालच में लड़कियों के दाख़िले बढ़े हैं. यह भी मालूम हुआ कि कई लोग अपने बच्चे का नाम सरकारी स्कूल में लिखा लेते हैं लेकिन उसे भेजते हैं किसी निजी स्कूल में. एक कारण यह है कि निजी स्कूल मान्यता प्राप्त नहीं है या फिर इसलिए भी ताकि सरकारी स्कूल वाली सुविधा भी मिलती रहे.
इसमें ग्राम प्रधान और अध्यापक दोनों का फ़ायदा है. इसे रोकने के लिए अब सरकार बच्चों की डिजिटल फोटोग्राफ़ी कराकर उन्हें एक पहचान नंबर देने जा रही है, यह पहचान हमेशा ऊंची क्लास तक छात्र के साथ रहेगी.
पास के शहाबपुर बाज़ार में कई निजी स्कूल हैं. पास पड़ोस के गाँव वाले रिक्शों पर अपने बच्चे यहाँ भेजते हैं और ऊंची फ़ीस भी देते हैं. ये वे अभिभावक हैं जो संपन्न हैं और पढ़ाई के प्रति जागरूक भी.
आज़ाद हायर सेकेंडरी स्कूल की टीचर रेशमा बानो कहती हैं कि निजी स्कूलों में शिक्षा का स्तर ज़्यादा अच्छा है इसलिए लोग वहां पैसा देकर भी पढ़ाते हैं, हालाँकि सरकार सरकारी स्कूलों में तमाम सुविधा भी दे रही है, वज़ीफ़ा भी ड्रेस और खाना भी. लेकिन वहाँ बच्चे ज़्यादा हैं और टीचर बहुत कम. वह भी खाना बनवाने और पोलियो में लगे रहते हैं. निजी स्कूलों की पढ़ाई का तरीका भी अलग है.
रोज़गारपरक शिक्षा
समस्या का एक और पहलू है कि पढ़-लिख लेने के बाद कोई शारीरिक श्रम वाला काम नहीं करना चाहता और बाबूगीरी की नौकरियां इतनी हैं नहीं. इसलिए कई माँ-बाप सोचते हैं कि पढ़ने के बजाय बच्चा खेत में ही काम करें.

शिक्षा को रोज़गारपरक बनाना भी एक अहम ज़रूरत है
बाराबंकी के बेसिक शिक्षा अधिकारी प्रवीण मणि त्रिपाठी कहते हैं कि सरकारी स्कूलों का माहौल बदलने के लिए शिक्षा को गुणवत्तापरक बनाकर उसमें व्यावसायिक शिक्षा को भी जोड़ना पड़ेगा.
उनका कहना है कि अगर सरकारी स्कूल उच्च तबके के बच्चों को अपने से जोड़ पाएं तो और लोग भी अपने बच्चे वहां पढ़ाने को प्रेरित होंगे.
सरकार ने निजी स्कूलों में 25 फ़ीसदी सीटें पड़ोस के ग़रीब बच्चों के लिए आरक्षित करने का क़ानून बनाया है लेकिन लखनऊ की सबसे बड़ी स्कूल श्रृंखला सिटी मॉन्टेसरी स्कूल के प्रबंधक जगदीश गांधी कहते हैं कि चूंकि सरकार प्रतिपूर्ति बहुत कम देगी इसलिए इन बच्चों का बोझ दूसरे बच्चों के अभिभावकों पर पड़ेगा.
जगदीश गांधी क़ानून के उस प्रावधान के भी ख़िलाफ़ हैं जिसमें क्लास एक से आठ तक कोई इम्तेहान न लेने और बिना रोक-टोक पास करते रहने की व्यवस्था है.
जगदीश गांधी के अनुसार सरकारी स्कूलों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वहां नीचे से ऊपर तक किसी की कोई जवाबदेही नहीं है.
मगर निजी स्कूलों पर नियंत्रण भी एक विकट समस्या होगी. इनकी संख्या उत्तर प्रदेश में लगभग 13 हज़ार है.
गुणवत्ता सुधारने के लिए सबसे ज़रूरी है पर्याप्त संख्या में शिक्षक. उत्तर प्रदेश में एक शिक्षक पर 51 बच्चों का औसत है जबकि राष्ट्रीय औसत 34 छात्रों पर एक शिक्षक का है.
संसाधनों का अभाव
उत्तर प्रदेश में अब भी 13,113 स्कूल ऐसे हैं जहां केवल एक शिक्षक उपलब्ध है. जिस दिन वह शिक्षक अवकाश पर हो या किसी अन्य सरकारी काम पर हो उस दिन समझें कि स्कूल बंद.

निजी संस्थान भले ही अंतरराष्ट्रीय मानकों के हो गए हों, पर बहुमत विद्यार्थी अभावों में पढ़ाई करने को मजबूर हैं.
यातायात के साधन और अन्य सुविधाएं न होने से सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में अध्यापक जाना नहीं चाहते, जबकि शहर और सड़क के करीब वाले स्कूलों में टीचर ज़्यादा हैं.
इसी तरह आर्थिक दृष्टि से संपन्न पश्चिमी ज़िलों में सरकारी स्कूलों में छात्र और शिक्षक ज़्यादा हैं, जबकि पूरब के ग़रीब ज़िलों में छात्र ज़्यादा और शिक्षक कम हैं.
आबादी के हिसाब से उत्तर प्रदेश में छस से 14 साल की उम्र के बच्चों की संख्या लगभग पौने छह करोड़ है. प्रदेश में इस समय तीन करोड़, 62 लाख 63 हज़ार बच्चे स्कूलों में पढ़ रहे हैं. निजी स्कूलों को मिलाकर भी बहुत से बच्चे स्कूलों से बाहर हैं.
आदर्श स्थिति में कम से कम 10 लाख शिक्षक होने चाहिए. वर्तमान में शिक्षकों के कुल स्वीकृत पद 4,06,607 हैं इनमें से लगभग एक तिहाई यानी 1,53,623 पद ख़ाली हैं. कमी को पूरा करने के लिए एक लाख 86 हज़ार शिक्षामित्र लगाए गए हैं.
नए क़ानून में केवल प्रशिक्षित शिक्षक को ही मान्यता दी गई है जबकि उत्तर प्रदेश में कई बरसों से बीटीसी की ट्रेनिंग ही बंद थी. अब ट्रेनिंग शुरू हुई है मगर एक साल में लगभग सात हज़ार बीटीसी शिक्षक ट्रेंड करने की क्षमता है. दूसरी ओर हर साल लगभग दस हज़ार टीचर रिटायर हो रहे हैं.
यानी एक अभियान चलाकर बड़ी संख्या में शिक्षकों की ट्रेनिंग और तैनाती की ज़रूरत है. ट्रेनिंग में यह बात भी शामिल हो कि टीचर बच्चों को पीटे और धमकाए बिना पढ़ने के लिए प्रेरित कर सकें.
इसके बाद यह भी ध्यान देने की ज़रूरत है कि स्कूलों का वातावरण ठीक हो यानी पर्याप्त रोशनी और हवादार कमरे हों, पेयजल, टॉयलेट, पुस्तकालय, टीचिंग सामग्री, खेल का मैदान और उपकरण हों. इन मामलों में उत्तर प्रदेश में अभी बहुत काम करने की ज़रूरत है.
क़ानून को लागू करने के लिए राज्यों को तीन साल का समय दिया गया है जिसमें स्कूलों के लिए सक्षम प्रबंधकीय ढांचा खड़ा किया जाना है. बताया जाता है कि विकसित राज्यों में एक विकेंद्रित प्रशासनिक मशीनरी है जो स्थानीय स्तर पर स्कूलों की मॉनीटरिंग करती है.
राज्य में औसतन आधे शिक्षक किसी न किसी कारण से स्कूलकार्य से ग़ायब रहते हैं. स्कूलों की संख्या दोगुनी हो गई है लेकिन सुपरवाइज़री स्टाफ़ नहीं है.
जवाबदेही की कमी
भ्रष्टाचार बढ़ गया है. बेसिक शिक्षा अधिकारी केवल मंत्री के प्रशासनिक नियंत्रण में हैं और वहां भी रिश्वत देकर तबादले-नियुक्तियां होती हैं. नतीजतन शायद उत्तर प्रदेश एक अकेला राज्य है जहां मिड-डे मील और बिल्डिंग निर्माण के अलावा टीचरों के तबादले में भी रिश्वत ली जाती है.

पिछड़े इलाकों में बच्चों को स्कूलों तक लाना एक चुनौती है
अन्य राज्यों की तरह यहाँ सरकार प्राइमरी शिक्षा ज़िला परिषद या शहरी स्थानीय निकायों को देने को तैयार नहीं. सरकार ऐसा कोई प्रशासनिक ढांचा नहीं बना रही जिससे टीचरों को पूरे समय पढ़ाने के लिए बाध्य किया जा सके.
नए क़ानून में यह व्यवस्था है कि टीचरों से चुनाव और जनगणना को छोड़ और काम न लिए जाएँ. इसका मतलब यह कि राज्य को अन्य कार्यों के लिए दूसरे स्टाफ़ रखने होंगे.
नए क़ानून में सरकार पर ज़िम्मेदारी डाली गई है कि निजी स्कूल अपने यहाँ 25 फ़ीसदी सीटें पड़ोस के निर्धन बच्चों के लिए रखें. दाख़िले में कोई अनुदान न लें और माँ-बाप या बच्चों का स्क्रीनिंग टेस्ट न लें. मगर इसको क्रियान्वित करने के लिए उत्तर प्रदेश में कोई मशीनरी नहीं है.
यूनिसेफ लखनऊ में शिक्षा विशेषज्ञ विनोबा गौतम कहते हैं, ''मुझे लगता है कि सरकार को कमर कसना पडेगा और कसना चाहिए ,लेकिन मै सहमत हूँ कि आज के दिन में सरकार अनभिज्ञ है कि आने वाले दिनों में उन्हें कौन सी चुनौतियों का सामना करना पडेगा. ''
लेकिन उत्तर प्रदेश में सर्व शिक्षा अभियान के निदेशक गांगुली कहते हैं, ''कॉमन यानि एक समान स्कूल की संकल्पना अब से चालीस वर्ष पहले कोठारी आयोग ने किया था. तब से किसी न किसी किसी कारणवश इसका क्रियान्वयन नही किया जा सका. कम से कम यह पहला कदम है कि हम कॉमन स्कूल की ओर अग्रसर हो रहे हैं.
आने वाले दिनों में अगर हम परिषदीय विद्यालयों में गुणवत्ता युक्त परिवेश, पर्याप्त सुविधाएं और छात्रों के अनुपात से शिक्षक सुनिश्चित कर सकें तो एक पड़ोस में रहने वाले सभी लोग अपने बच्चों को इन स्कूलों में भेजेंगे.''
एक हकीकत है कि सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर ठीक न होने से संपन्न लोग अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढाते हैं. अब केवल गरीब लोग ही अपने बच्चे सरकारी स्कूलों में भेजते हैं.
एक अध्ययन के मुताबिक इसका मतलब है कि इन स्कूलों में ज्यादातर बच्चे दलित और मुसिलम समुदायों के हैं. इस लिए सबसे ज्यादा लाभ इन्ही बच्चों को मिलेगा.
इस लिहाज से इस नए कानून को प्रगतिशील और क्रांतिकारी भी कहा जा रहा है. लेकिन कई लोग यह कहकर आलोचना भी करते हैं कि यह एक समान शिक्षा के बजाय दोहरी व्यवस्था को मान्या देता है

लाइलाज बीमारी से पीढ़ित दो बहनें

फिरोज़ाबाद के एक ग़रीब मुस्लिम परिवार में जन्मी दो बहनें एक लाइलाज बीमारी से पीढ़ित हैं। उनकी ज़िंदगी बिस्तर पर ही गुज़र रही है। पर इस लाचारी में भी इन दोनों बहनों की ज़िंदादिली काबिले तारीफ है। राशि और सोनम की उम्र 18 और 13 साल है। वक्त के साथ ये बड़ी ज़रूर हुईं पर इनका शरीर नहीं बढ़ा। ये दोनों बहनें ऐसी बीमारी से पीड़ित हैं जिसका मेडिकल साइंस में कोई इलाज नहीं है। इन दोनों के शरीर का विकास सिर्फ ढाई साल के बच्चे जितना ही हो पाया है। इसके बावजूद राशि और सोनम के चेहरे पर मुस्कराहट के सिवा और कुछ नहीं है। इनके चेहरों पर दर्द या शिकन कहीं दिखाई नहीं देती। दोनों बहनें ज़िंदगी के हर पल का आनंद ले रही हैं। दोनों को टीवी सीरीयल देखना बेहद पसंद है और बालिका वधू इनका सबसे फेवरिट सीरियल है। फिल्मी हीरो में सलमान खान और शाहरुख खान की ये दोनों ही फैन हैं। इनके फिल्मी गाने इनको बहुत पसंद हैं। इनकी पसंदीदा हीरोइन करीना और कैटरीना कैफ हैं। दोनों की दिली ख्वाहिश है करीना और कैटरीना से मुलाकात करने की। जिन मुश्किलों से बड़े-बडे टूट जाते हैं उनसे ये दोनों बहनें बहादुरी से मुकाबला कर रही हैं। राशि और सोनम के ज़िंदगी के इसी जज़्बे को हम सलाम करते हैं।

चारित्रिक मूल्यों का विकास

चारित्रिक मूल्यों का विकास जो कष्ट सहना नहीं जानता या उसके लिए तैयार नहीं है, उसे विकास का सपना नहीं देखना चाहिए। हर बड़े काम के लिए कष्ट उठाना पड़ता है, रिस्क लेनी पड़ती है। सांस्कृतिक मूल्यों का विकास, राष्ट्रीय और चारित्रिक मूल्यों का विकास, ये सब महलों में बैठकर सुख भोगते हुए नहीं किए जा सकते। इसे तो झोपडियों में रहकर, कष्ट सहकर ही किया जा सकता है। इसलिए अहिंसा के भव्य प्रासाद में प्रवेश करना है, अहिंसा को जीना है तो सबसे पहले उसके प्रथम दरवाजे में प्रवेश करें। राजस्थानी भाषा में यह सतपोलिया यानी सात द्वारों वाला मकान है। अहिंसा के चार दरवाजे हैं। पहला क्षांति या सहिष्णुता, दूसरा आकिंचन्य या अनासक्ति, तीसरा है सरलता और चौथा है मृदुता, कोमलता, करूणा और संवेदनशीलता, इन चारों से गुजरने के बाद ही अहिंसा के साक्षात् दर्शन हो सकते हैं, हमारी मुश्किल यह है कि बिना इन दरवाजों में प्रवेश किए हम अहिंसा तक पहुंचना चाहते हैं। ऎसी स्थिति में सफलता कैसे मिले? सब लोग बातों पर चिंतन करें और इन दरवाजों में प्रवेश करने की अर्हता और योग्यता अर्जित करने का प्रयत्न करें। जब तक यह प्रवेश पत्र नहीं पा लेते, अहिंसा तक पहुंचने की आशा न करें। शांतिपूर्ण जीवन और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व, जिनकी आज पूरे विश्व में चर्चा है, वह सम्भव नहीं हो पा रहा है, क्योंकि क्षांति के दरवाजों में प्रवेश नहीं हो पा रहा है। बिना अर्हता और योग्यता के सीधे प्रवेश करना चाहते हैं, यह सम्भव नहीं है। अगर प्रवेश द्वार में प्रविष्ट होने की योग्यता और क्षमता हासिल हो जाए तो एक नए विश्व की कल्पना, जिसमें शांति होगी, सहिष्णुता होगी, सामंजस्य होगा, सम्भव हो सकेगी।

वकीलों के आंदोलन से ठहरा पश्चिमी उप्र

मेरठ/मुरादाबाद/गाजियाबाद/अलीगढ़। प.उप्र में हाईकोर्ट बेंच स्थापना की मांग को लेकर मेरठ, मुरादाबाद, गाजियाबाद और अलीगढ़ में अभूतपूर्व बंद रहा। पिछले 28 वर्षो से लगातार चल रहे आंदोलन में पहली बार जनता भी वकीलों के साथ खड़ी नजर आयी। इस दौरान वकीलों ने नया गाजियाबाद रेलवे स्टेशन पर शालीमार एक्सप्रेस रोक दी, वहीं कई स्थानों पर जाम भी लगाया। इतना ही नहीं, कई दुकानों को जबरन बंद कराया गया। मुरादाबाद में अधिवक्ताओं ने दिल्ली से गुवाहटी जाने वाली राजधानी एक्सप्रेस मुरादाबाद जंक्शन पर रोककर प्रदर्शन किया। उधर, अधिवक्ताओं ने अलीगढ़ में दीवानी कचहरी के बाहर रास्ता जाम कर टायर फूंक कर गुस्से का इजहार किया। इसके बाद अधिवक्ता सीमा फाटक के पास दिल्ली-हावड़ा ट्रैक मालगाड़ी को रोककर इंजन पर चढ़ गए। आक्रोशित अधिवक्ताओं के प्रदर्शन के चलते रीवा एक्सप्रेस को स्टेशन पर ही करीब 20 मिनट तक रोकना पड़ा। आंदोलन के चलते पउप्र में परिवहन सेवा भी बाधित रही।
मेरठ कार्यालय के अनुसार गुरुवार को दिल्ली-देहरादून, मेरठ बदायूं व लखनऊ राज मार्गो के अलावा मुख्य सम्पर्क मार्गो, बाजारों, मंडी, शिक्षण संस्थाओं, पेट्रोल पम्प, गैस एजेंसी, नर्सिग होम, क्लीनिक, दवाघरों व व्यापारिक प्रतिष्ठानों में सन्नाटा छाया रहा। बसों, ट्रकों व टेम्पुओं के पहिये थमे रहे। बंद कराने को वकीलों, व्यापारी नेताओं व राजनीतिक दलों की टोलियां सुबह से ही बाजारों में निकल गयी थी परन्तु लोगों ने अपने प्रतिष्ठान स्वेच्छा से ही बंद कर दिये थे। वैली बाजार, हापुड़ रोड व सदर में इक्का-दुक्का दुकानों को बंद कराने को नोंकझोंक हुई। इस दौरान वकीलों ने 12 स्थानों को चिन्हित कर चक्का जाम किया। वकीलों ने प्रात: पांच बजे से भैंसाली मैदान व सोहराब गेट अड्डों की नाकेबंदी कर बसों की आवाजाही रोक दी थी। व्यापारी, शिक्षक व छात्र संगठनों के पदाधिकारियों के अलावा सभी दलों के नेता भी बंद सफल बनाने में जुटे रहे। बेगमपुल पर विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों ने मानव श्रृंखला बनाई गई। सपाइयों ने केन्द्र सरकार का पुतला फूंका। संघर्ष समिति के चेयरमैन जीएस धामा ने बताया कि आंदोलन की अगली रणनीति तय करने को केन्द्रीय संघर्ष समिति की बैठक 19 सितम्बर को नोएडा में होगी। बागपत में राष्ट्र वंदना चौक पर वकीलों ने सुबह से ही जाम लगा दिया। बाजार और सड़कें सूनी रहीं। बड़ौत और खेकड़ा में वकीलों ने ट्रेन रोकी और जुलूस निकालकर धरना दिया। बुलंदशहर में दोपहर बाद वकीलों ने हड़ताल खत्म कर दी। सहारनपुर में भी बंदी का व्यापक असर दिखा। मुजफ्फराबाद से निर्दलीय विधायक इमरान मसूद और भाजपा के शहर विधायक राघव लखनपाल शर्मा ने तो बेंच के लिए इस्तीफे तक की पेशकश कर दी। मुजफ्फरनगर में दुकाने बंद कराने को लेकर कहीं कहीं झड़प भी हुई। वहीं बिजनौर में वोडाफोन कंपनी का स्थानीय कार्यालय खुला मिलने पर गुस्साए वकीलों ने शीशे तोड़ दिए तथा एक कर्मचारी की पिटाई कर दी।
गाजियाबाद कार्यालय के अनुसार बार एसोसिएशन के सचिव के नेतृत्व में वकीलों व अन्य नेताओं की एक टोली नया गाजियाबाद रेलवे स्टेशन पर पहुंची और वहां शालीमार एक्सप्रेस को रोक दिया। उसके बाद सभी लोग अनाज मंडी पर एकत्र हुए और बाजार बंद कराए। इन लोगों ने घंटाघर, गोल मार्केट, दिल्ली गेट, डासना गेट, तुराबनगर, गांधीनगर समेत सभी मार्केट पूरी तरह से बंद करा दिए। इस दौरान कई दुकानदारों को वकीलों की पिटाई का शिकार होना पड़ा। इस तरह कई स्थानों पर झड़प हुई। अधिवक्ताओं ने बाजार बंद कराने के बाद प्रमुख स्थानों और चौराहों पर जाम-प्रदर्शन किया।
मुरादाबाद कार्यालय के अनुसार मंगलवार और बुधवार को यहां अधिवक्ता न्यायिक कार्य से विरत रहे। इसके बाद गुरुवार के लिए बाजार बंद का कार्यक्रम निरस्त करके दि बार एसोसिएशन एवं लाइब्रेरी की बैठक में रेल चक्का जाम का फैसला लिया था। तयशुदा कार्यक्रम के तहत गुरुवार को मध्याह्न में काफी संख्या में एसोसिएशन के सदस्य अधिवक्ता जंक्शन पहुंच गए। दिल्ली से गुवाहटी जाने वाली राजधानी एक्सप्रेस को अधिवक्ताओं ने आते ही रोक लिया। कई अधिवक्ता तो पटरी पर लेट गए और कई इंजन पर चढ़ गए। जमकर नारेबाजी के बीच अपनी मांग को उन्होंने दोहराया। जहां अधिवक्ताओं ने ट्रेन आधे घंटे रोके रखने का दावा किया, वहीं एडीआरएम एनपी सिंह का कहना है कि ट्रेन का यहां पांच मिनट का स्टापेज है, उतनी ही देर ट्रेन रुकी।

संचार क्रांति‍

इन दिनों यह धारणा प्रचलन में है कि अच्छा लेखन वही है जिसका वाचन के साथ फर्क न किया जा सके। हिन्दी के साहित्यकार आए दिन बोलचाल की भाषा में साहित्य सृजन पर जोर देते हैं। समस्या यह है कि जब एक बार स्वचालित वाचन को अच्छे लेखन के रूप में स्वीकार कर लिया जाएगा तो इसमें यह भाव भी निहित है कि स्वचालित वाचन विश्वसनीय है। उसे पढ़ सकते हैं। किंतु पढ़ते धीमी गति से हैं और बोलते तेज गति से हैं। अथवा जहां पर हम धीमी गति से बोलते या सुनते हैं वहां पर भी धीमी गति से पढ़ते हैं। असल में हमारा दिमाग बोलने और सुनने के लिए तैयार हुआ था न कि पढ़ने और लिखने के लिए। भाषा की तुलना में हमारे लेखन की व्यवस्था ज्यादा जटिल है। बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि विपरीत है। भाषा के साथ आज भी भाषाशास्त्री संघर्ष कर रहे हैं। कम्‍प्‍यूटर भाषा का निश्चित व्याकरण अभी तक नहीं बन पाया है। लेखन और वाचन के बीच आज भी संघर्ष चल रहा है। हमें भूलना नहीं चाहिए कि ऑडियो रिकॉर्डिंग आने के पहले वक्तृता का कोई स्थायी प्रमाण नहीं था। सिर्फ सुनने या बोलने वाले के ऊपर कुछ देर तक असर रहता था।
इसके विपरीत कम्‍प्‍यूटर लेखन 'करो और फिर करो' की तरह है। इसके गर्भ से जो सामग्री निकलती है वह रूपान्तरित होकर सामने आती है। इसके प्रत्येक रूप को लंबी अवधि‍ तक संरक्षित किया जा सकता है। लेखन का मर्म यह है कि उसे संरक्षित कर सकते हैं। मेनीपुलेट कर सकते हैं।इसमें बाद में सामग्री शामिल कर सकते हैं। यही कम्‍प्‍यूटर लेखन का कौशल है। लेखक अभ्यास, भूल और फीडवैक के जरिए सीखता है।वह सिर्फ जानने मात्र से नहीं सीखता।इसके विपरीत जब एकबार बोलने का हुनर आ जाता है तो बोलना जान जाते हैं।बोलने में जानना ही महत्वपूर्ण है। आज डिकटोफोन ने यह संभव कर दिया है कि आप अपना भाषण लिखित रूप में पढ़ सकते हैं।उसे संशोधित कर सकते हैं। कम्प्यूटर में कनवर्जन के कारण आप अपने भाषण को सुन सकते हैं, देख सकते हैं,पढ़ सकते हैं।जरूरत इस बात की है कि आपकी कम्प्यूटर पर मास्टरी हो।यह एक तरह से यूजर को मास्टर बनाने वाली बात है।
सभ्यता के इतिहास में यूजर मास्टर पहलीबार बना है। आज लेखन उच्च कोटि का हुनर है। भाषण उच्चकोटि का हुनर नहीं रहा। आज इन दोनों के ही प्रशिक्षण पर जोर दिया जा रहा है। किंतु तकनीकी विकास के क्रम में एक अन्तर्विरोध पैदा हुआ है।यह संभव है बच्चों को लेखन का अभ्यास ही न कराया जाए। तब शिक्षण का क्या होगा ? आर्थिक प्रयासों का क्या होगा ? क्या इसका परिणाम यह होगा कि बच्चे सिर्फ पढ़ेंगे ? अथवा शिक्षण में लेखन और रीडिंग दोनों पर जोर होगा ? यह भी संभावना है कि खिचड़ी भाषा आ जाए। खिचड़ी भाषा और ध्वनियों को ही पढ़ाया जाएगा। उसी के जरिए सिखाया जाएगा। ऐसे में हम पाठ के मेनीपुलेशन से दो-चार होंगे।यह भी संभावना व्यक्त की जा रही है कि लेखन का प्रशिक्षण पुराना काम हो जाएगा। इसी तरह वक्तृता में परिवर्तन आने शुरू हो चुके हैं।वर्चुअल लेखन की तरह वर्चुअल भाषण के युग का श्रीगणेश हो गया है।वर्चुअल भाषण के कारण गद्य कला के लोप की संभावनाएं बढ़ गई हैं।हमने लेखन के कारण निबंध गद्य के विभिन्न रूपों को जन्म दिया। उसे लिखा। पढ़ा।किंतु वर्चुअल वाचन के युग में यह संभव नहीं होगा।आज हालात बदल गए हैं नयी तकनीक सांस्कृतिक संचय कर रही है। सूचना की खान तैयार कर रही है।ऐसे में सभ्यता की बुनियादी प्रकृति में भी परिवर्तन आया है। हम लेखन से 'स्काई लेखन' के युग में पहुँच गए हैं।यह तीव्रगति का लेखन है।इसमें मेनीपुलेशन की अनंत संभावनाएं हैं।यह ऑन लाइन लेखन है। डिजिटल पाठ है। वह वाचिक सामग्री को तेजी से रूपान्तरित कर रहा है। इसने लेखन के क्षेत्र में स्पीड, संभावना और अंतर-संपर्क को बुनियादी तत्व बना दिया है। लेखन के हुनर के अनेक तत्वों को कम्प्यूटर ने आत्मसात कर लिया है। स्मृति के बहुत सारे लक्षण अपने अंदर समाहित कर लिए हैं। इसने हमें 'फिजिकल पुस्तक' यानी 'पी-बुक' के युग से निकालकर 'वर्चुअल बुक' या 'वी बुक' के दौर में फेंक दिया है।यह वर्चुअल वर्ल्ड है।इसकी समस्याएं अलग हैं।
'वी बुक' में वह सब है जो 'पी-बुक' में था।इसके अलावा इसकी प्रतियां सहज ही बगैर किसी खास लागत के तैयार हो सकती हैं।'वी बुक ' को आप डाउनलोड कर सकते हैं।इसके पाठक सब जगह हैं।'वी बुक' के कारण लेखक-प्रकाशक संबंधों में बदलाव आया है।रॉयल्टी,प्रकाशन रायल्टी की अवधि, आदि नई समस्याएं सामने आ गई हैं। प्रकाशक को मुद्रित पुस्तक छापने का हक है।डिजिटल पुस्तक प्रकाशित करने का हक नहीं है। डिजिटल प्रकाशन की समस्याओं पर हमारे यहां अभी सोचना शुरू नहीं हुआ है। डिजिटल युग में लेखक के अधिकारों के बारे में हमे सोचना होगा। 'वी बुक' के कारण पुस्तकालय की भी प्रकृति बदलेगी।अभी हमारे पुस्तकालयों में पुस्तक होती है। किंतु 'वी बुक' के कारण इसकी प्रतिलिपि आसानी से हासिल कर सकते हैं। इसकी कीमत भी कम आएगी। असल में यह 'प्रिण्टिंग रीडिंग मोड' से 'राइटिंग रीडिंग मोड ' में रूपान्तरण है। पुस्तक का जन्म वस्तु के स्वामित्व के दौर में हुआ। जबकि 'वी बुक' का युग 'रेंटिंग' या भाड़े का युग है। 'वी बुक ' के दौर में यह संभव है कि 'वी बुक' खरीदकर पढ़ो या उसका पाठ खरीदकर पढ़ो ,या किराए पर पढ़ो।भविष्य में क्या होगा कोई कुछ नहीं जानता। सवाल यह उठता है कि इस परिवर्तन प्रक्रिया में जनमाध्यमों के पास क्या बचा रह जाएगा ?

मंगलवार, 1 सितंबर 2009

फिरोज़ाबाद संसदीय निर्वाचन क्षेत्र
(परिसीमन आयोग के अनुसार)
जिला - फिरोज़ाबाद

संसदीय निर्वाचन क्षेत्र उत्तर प्रदेश
क्षेत्र का विस्तार विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र के सन्दर्भ में
फिरोज़ाबाद
95-टुन्डला (अ0जा0), 96-जसराना, 97-फिरोजाबाद, 98-शिकोहाबाद और 99-सिरसागंज ।
उत्तर प्रदेश राज्य संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों की सूची
फ़िरोज़ाबाद मुग़ल काल से बसा भारत के उत्तर प्रदेश प्रान्त का एक जिला है। यह शहर चूड़ियों के निर्माण के लिये मशहूर है! शहर फीरोजाबाद आगरा से 40 किलोमीटर और राजधानी दिल्ली से 250 किलोमीटर की दुरी पर पूरब की तरफ स्थित है उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनउ यहां से लगभग 250 किमी पुरब की तरफ है फिरोज़ाबाद ज़िले के अन्तर्गत दो कस्बे टूंडला और शिकोहाबाद आते हैं. टुंडला पश्चिम तथा शिकोहाबा्द शहर के पूरब में स्थित हैं इस शहर को फीरोज़शाह तुग़लक़ ने बसाया था फीरोज़ाबाद में चूडीयों का कारोबार मुख्यता से होता है यहाँ पर आप रंग बिरंगी चुडियों के ठेले अपने चारों ओर देख सकते हैं यहां की फेकेटरियों से निकलने वाला धुआं यहां के लोगों को बीमारियों का तोहफा तो देता ही है ताज की खूबसूरत इमारत को भी नुक़सान पहुंचाता है इस प्रगति के दौर मे भी यहां के अक्सर कारखाने और भट्टियां कोयले से ही चलती हैं जिनका धुआं यहां के लोगों के लिये खतरनाक और जानलेवा साबित हो रहा है इसी कारण यहां की अधिकांश आबादी दमा और टीबी जैसे रोगों से पीडित है इस शहर की आबो हवा गरम है यहां की आबादी बहुत घनी है यहां के ज्यादातर लोग कोरोबार से जुडे हैं घरों के अन्दर महिलाएं भी चूडियों पर पालिश और हिल लगाकर रोजगार अर्जित कर लेती हैं । बाल मज़दुरी यहां आम है सरकार तमाम प्रयासों के बावजूद उन पर आंकुश नहीं लगा सकी है